Friday, July 31, 2009

नारकीय विनेश : एक परिचय

(Mere Dost Mulla Nasruddin ki Peshkash)

कौन वो अवधूत है
बातें जिसकी अनुभूत है
अरे मिथ्या का वह दूत है
वो विनेश राजपूत है.......

पद्य जिसके सुखांत है
ना जाने क्या चक्रांत है
मनुज वो दुर्दांत है
दिखता संभ्रांत है
उलझा हुआ जो सूत है
वो विनेश राजपूत है...........

जिसके मुंह में ना दांत है
पेट में ना आंत है
वृद्ध, अशक्त, क्लांत है
रहता वह अशांत है
बिगडा उसका भूत है
वो विनेश राजपूत है.........

कोई जात है ना पांत है
बनता कुशवाहा कान्त है
कहाँ उस का प्रान्त है
उत्तरी या सीमान्त है
टेढी हर करतूत है
वो विनेश राजपूत है........

शब्द उसके मर्मांत है
झूठ सब वृतांत है
ओछापन चर्मांत है
संग उसका दुखांत है
किस मां का वो कपूत है
वो विनेश राजपूत है........

ज्ञानी वह चुडांत है
क्यों फिर भयाक्रांत है
जब नहीं दिग्भ्रांत है
तब क्यों नहीं प्रशांत है
लगता जो पराभूत है
वो विनेश राजपूत है........

नारकीय=नरक में जाने के योग्य, शेष शब्दों के लिए कृपया शब्दकोष की सहायता लें......

Monday, July 27, 2009

एक नज़्म : दिल जले आशिक की....(दीवानी सीरीज)


सोचा थोड़ा सा बदलाव हो,मेरे पोस्ट्स के मिजाज़ में.....सदाबहार 'दीवानी सीरीज़' की जानिब आपको ले जाना चाहता हूँ. उम्मीद है आपका प्यार मेरी इस 'बेवकूफी' को भी मिलेगा.

प्यार में तकरार....(बात दीवानी की)

प्यार में तकरार भी होता है, शायर/शायरा होने के नाते आप से ज्यादा कौन जानता है इस बात को. एक बार किसी बात पर हमें दीवानी की नाराज़गी नसीब हो गयी ...कालिज कि मैगजीन में एक ग़ज़ल उसके जानिब से छपी थी :

तुम्हारे आलम से चले जायेंगे हम
कसम खुदा की बहोत याद आएंगे हम.

रहोगे ढूंढ़ते हमें ज़माने में सनम
नजर तुमको ना फिर आयेंगे हम.

माना कि बहोत सताया है हमने तुमको
सताने कि खातिर फिर ना आयेंगे हम.

दोगे आवाज़ जो तड़फ कर हम को
बुलाये से भी ना फिर आयेंगे हम.

ना होगा तुझ से अब कोई शिकवा
तेरे जहान में ना फिर आयेंगे हम.

एक नज़्म : दिल जले आशिक की...(वि)

बहुत तड़फ उठा था मैं इस ग़ज़ल को पढ़ कर. सब कुछ 'upside down' सा लगने लगा था. उसके बिना ज़िन्दगी का तसव्वुर करना भी नागवार लग रहा था.यह जानते हुए कि यह सब बातें बेमानी है. यह नाराज़गी का एक फेज था बस. सारी बेवक्त सायानी हुई गंभीर सोचें मानो ताश के पत्तों के मुआफिक गिरती जा रही थी. एक किशोर की तरह मैं व्याकुल हो रहा था . इस खिंचाव में भी अपना एक लुत्फ़ था [:)]
अधूरेपन का आनंद ही कुछ और होता है.यह उस वक़्त का सच था. आज अपनों के साथ बैठ कर अचानक पुरानी बातें दोहराई जा रही थी, अपने बचपने पर हंसी भी बहुत आ रही थी, मगर जीये हुए उन पलों में एक प्यारी सी कशिश थी. आज भी वो यादें एक खुशनुमा एहसास देती है इससे इनकार करना मेरी हिपोक्रिसी होगा.
हाँ तो आज मुझे कहीं रखी मेरी यह नज़्म फिर से हासिल हुई जिसे आप से शेयर कर रहा हूँ. बस इस दिलजले आशिक की इस नज़्म की सिर्फ हिस्टोरिकल वेल्यु है मेरे लिए और कुछ नहीं. आज मैं भी खुद पर हँसता हूँ सोच कर कि क्या यह नज़्म मेरी कलम की पैदाईश है ?

जब तू ना होगी...............

जब तू ना होगी
ज़िन्दगी महज़
एक सूना सा मकबरा होगी
जिसमें दफ़न चंद यादें
चंद एहसास और थोडी सी
बेवफाई होगी
मुआफ करना गर दिल तेरा
कभी दुखाया हो
बिना वज़ह तुमको
कभी सताया हो
इसीलिए तो ना करते थे
हम इजहारे मोहब्बत
सोचते थे कहीं तेरी भोली सूरत ने
हमें भरमाया हो
कह दिया था जब हमने
अपना हाल-ए-दिल तुझ को
तड़फ तुम्हारे जानिब से
लगने लगी थी कुछ कम हम को
मेरी खामोशी शायद
रहती सताती तुझको
असमंजस की बातें तुम्हे
शायद मिला देती मुझ को
काश मेरा सर पूजन में नहीं
सजदे में झुका होता
मेरा यह दिल तूने
इस कदर ना फूका होता
क्या मिला तुझ को
खेल कर मेरे अरमानों से
जानम कभी ना दिल लगाना
मुझ से दीवानों से
माना कि तुम चली जाओगी
मेरी दुनिया से
हम तो इस दुनिया से चले जायेंगे
आसमान के उस पार खड़े
तुमको मुस्कुराते देख
मुस्कुराएंगे........
तुम बिन जीना भी क्या जीना है
मोहब्बत कि बेदी पर
खुद को न्यौछावर कर जायेंगे
याद आएगा जन्नत में भी
यह रूठना तुम्हारा
तुम किसी और के साथ हो
कैसे होगा हमें गवारा
अप्सराओं को मनाने का तरीका
देवताओं से
सीख कर लौट आयेंगे
अलविदा मेरी साँसों की मालिक
अगले जन्म में तुमको फिर पाएंगे......











मुल्ला के 'logical interpretations'

मुल्ला नसरुद्दीन भी अपने स्वार्थ और अहम् के अनुसार धर्म और नैतिकता कि व्याख्या करनेवालों में से हैं. विश्वबंधुत्व के भाव की वज़ह से धनाधन विलायती चीजों का इस्तेमाल करते हैं....मेरे हर दोस्त से जो विदेश से लौट-ता है या आता जाता है, मुल्ला की फरमाईश पर परफ्यूम,कपडे, चोकलेट्स, इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स, स्कोच, इन्नर वेअर्स और कुछ उट पटांग चीजे जिनका यहाँ जिक्र करना शालीनता के नाते उचित नहीं होगा, नसरुद्दीन को बतौर गिफ्ट लाकर चढाता है. हाँ रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में 'दस्तरखान से हमाम-ओ-संडास' तक मुल्ला एक दम देशी है. नमाज़ के मुआमले में, रोजा रखने की बात में अपने अकाट्य तर्कों को रख कर या बहाना बना मुल्ला खिसक जाते हैं, मगर बच्चे पैदा करने के मुआमले में बिलकुल मज़हबी फरमान को मानते हैं. तभी तो कुल मिलाकर १७ जिंदा औलादें हैं अपनी तीनों बीवियों से. दो को तो तलक दे चुके, अब एक बीवी १७ बच्चे, छोटा घर, कम आमदनी, क़र्ज़ कि अर्थव्यवस्था, मगर फज़ुलखर्ची......मुल्ला का दिमाग खुराफाती.
मैं अपने काम के सिलसिले में दूसरे शहर जा कर बस गया था . एक दफा किसी कांफ्रेंस के सिलसिले में मुल्ला के शहर में चला आया. नेचुरली, अपने जिगरी दोस्त के घर बुलाये बिन बुलाये मिलने जाना लाजिमी था....मॉल से थोडी टोफियाँ और बिस्किट्स , मिठाई दूकान से लड्डू उठाये और पहुँच गया मुल्ला के घर.

भाभीजान 'as usual' थोडी तुनकायी सी, थोडी खीजी सी थी...घर कि हालत और बिन बुलाये मेहमान का चले आना, मगर मेरे चेहरे पर स्नेह के भाव देख कर और हाथों में बड़े बड़े पेकेट देख कर उनका थोड़ा ह्रदय परिवर्तन हुआ, मेरा स्वागत किया गया. मैंने देखा फटेहाल घर में सिर्फ दो बच्चे उछल कूद कर रहे थे.....एक अलमारी से कूद रहा था तो दूसरा सोफे पर रॉक-न-रोल कर रहा था.....मुल्ला ने तुंरत अपनी फटी लुंगी को बदल कर पयजामा कुरता पहना. रस्मी दुआ सलाम हुई, यारों के गिले शिकवे हुए, हम से तो अच्छे तुम रहे जैसी बातें हुई....मैं पूछ बैठा , "अमां मुल्ला तुम्हारे तो १७ बच्चे हैं, यहाँ तो बस दो ही दिखाई दे रहे हैं, बाकि १५ कहाँ है......?"
मुल्ला बोला आजकल मैं थोड़ा तरक्की-पसंद हो गया हूँ. परिवार-नियोजन वालों कि बातों पर अमल करने लगा हूँ. वोह बहोत बातें कहते हैं उनमें से एक यह भी तो है, "एक या दो बच्चे, होते हैं घर में अच्छे." इसलिए मैंने बाकियों को पड़ोसियों के घर भेज दिया है.
मैंने सर पकड़ लिया, मुल्ला कि हाजिरजवाबी और अवसरवादिता को देख कर.

Sunday, July 26, 2009

मुल्ला टाईगर या वेट कैट (भीगी बिल्ली)........

अमूमन सभी खाविंद अपनी अपनी बीवियों से या तो डरते हैं या डरने का स्वांग करते हैं....क्या होता है इसका मनोविज्ञान इसकी चर्चा फिर कभी. बहरहाल मेरे जिगरी दोस्त मुल्ला नसरुद्दीन भी इस बात का अपवाद नहीं थे. बाहर टाईगर बने घूमते और घर में घुसते ही भीगी बिल्ली. हम सब जानकर भी अनजान बन जाते कि मुल्ला और भाभी का समीकरण कुछ ऐसा सा है याने टाईगर और भीगी बिल्ली सा. मैं कहा करता, "Mulla, tiger is a big cat or cat is a small tiger ?" इस उम्मीद में कि मुल्ला कुछ कहे, कुछ दिल कि बात बताये....अपने 'सुखद' दमत्य जीवन के कुछ सजीव किस्से सुनाये. मुल्ला वैसे तो बहिर्मुखी व्यक्तित्व... किन्तु इस मुआमले में बिलकुल सूम. एक दिन मुल्ला मूड में था, देने लगा स्टेटमेंट :
"अबे प्रोफ़ेसर सुन ! आज तेरी भाभी बेगम साहिबान के घुटने टिका दिए."

मैंने भी communities में जिस तरह फास्ट कमेंट्स पोस्ट्स पर दिए जाते हैं, अपनी टिपण्णी बढा दी :
"वाह ! मेरे टाईगर.... कमाल कर दिया तू ने.....आखिर साबित कर दिखाया कि तू सच्चा मर्द है."

मुल्ला के घनी मूंछ दाढ़ी होने, छः संतान को सफल पैदा करने-जिनमें सभी के चेहरे मुल्ला जैसे हैं (एकाध क्लोन बच्चा पड़ोस में भी देखा गया) के बावजूद मेरे जैसे शिक्षित इन्सान का यह कथन, "कि तू सच्चा मर्द है." थोड़ा अजीब है ना, मगर सोसाइटी में ऐसा ही बिना सोचे कह दिया जाता है, जैसे 'आटा पिसाना', 'उसके सगे पिताजी थे' वगैरह .

हाँ तो नसरुद्दीन बोला, " अमां रहे ना तुम पढ़े लिखे अहमक, क्या हुआ दुनिया-जहान को पढाते हो....अरे बेवकूफ ! वह पलंग के पास जमीन पर घुटनों के बल बैठ झुक कर मुझे कह रही थी-मुल्ला बाहर निकल आओ... वादा करती हूँ कुछ नहीं करुँगी-कुछ नहीं कहूँगी-----बस यार जान बची लाखों पाए."

मैं बेवकूफ कि तरह मुल्ला कि तरफ देख रहा था , और मुल्ला मेरे ड्राइंग रूम में बोन-चाइना के कप से सौसर में चाय ढाल कर जोरों से फूंक मार रहा था.

Saturday, July 25, 2009

जीतना मानसिक तनाव को.

बहुत ही संक्रमण कल से गुजर रहें है हम. वैशविकरन,शहरीकरण,बाज़ार-अर्थव्यवस्था,आपसी जानी अनजानी प्रतिस्पर्धा,मानवीयमूल्‍यों में बदलाव, प्रदूषण इत्यादि ने हमारी मानसिक शांति हर ली है. हमारा मानसिक तनाव हमें दे रहा है: अनिद्रा,चिंता,डिप्रेशन आदि मानसिक रोग. बुद्धि(इंटेलेक्ट) और सूचना की आवश्यकता से अधिक उपलब्धि मिल कर जहाँ हमें लाभ पहुँचा रही है वहीं मानवता पर बहुत से कहर भी ढा रही है. क्या हम इन सब से व्यतीत हो कर पलायन कर लें ? नहीं, हमें इन सब के साथ जीना है, हार नहीं माननी है. कुछ ऐसा करना है जिससे साँप भी मार जाए और लाठी भी नहीं टूटे. हमें सकारात्मक सोच रखते हुए खुद को इन सब असंगतियों और विसंगतियों के बीच खुद को बुलंद करना है, कुछ उपाय सुझाने का प्रयास है यह आलेख.

मानसिक तनाव स्नायुतन्त्र पर अत्यधिक दवाब की स्रॅस्टी करते हैं, और फलतः वे अपना काम ठीक से नहीं कर पाते. कैसे को इनकी कार्यप्रणाली में सुधार ?

1) पोषण तत्वों से भरपूर भोजन : भोजन में खनिज और विटामिन्स की उपस्थिति स्नायूतांत्रों को पुष्ट करती है. भोजन में एंटी-ऑक्सिडेंट्स होंगे तो दिमाग़ और देह मानसिक आघात का मुकाबला और आसानी से कर सकेंगे. हमारा आहार संतुलित होना चाहिए. सेव, बादाम, आँवला,अखरोट, पीशता, काजू,सरपगंधा,ब्राहमी, अश्वगंधा आदि में एंटी-ऑक्सिडेंट्स पाए जातें हैं. चिकितस्क की सलाह से मल्टिविटमिन एंटी-ऑक्सिडेंट औषधियां भी ली जा सकती है
.
2) व्यायाम: शरीर और मान को सुडौल करतें है. ऑक्सिजन की अधिक मात्रा उपलब्ध करते हैं. फूर्ती . और पॉज़िटिव विचारों को बढ़ावा मिलता है.

3) शीघ्र सोना और शीघ्र जागना.

4) निरपेक्ष भाव : विपरीत प्रस्थितियों में स्वयं की मानसिकता को प्रभावित ना होने देने का अभ्यास. बस अब्ज़र्वर बन को देखना.

5) एकाग्रता: ध्यान द्वारा.

6) शक्ति का सन्चय: व्यर्थ बोलने या अन्या व्यर्थ क्रियाकलापों से दूर रहने से शक्ति का सन्चय होता है. Observing silence (मौन). Slow but steady गति से कार्य करना.

सुझाए गये मार्ग केवल इंगित मात्रा है, खोजी को अपनी खोज कर अपने लिए मार्ग बनाना होगा. यह आलेख मात्र एकछोटी सी कंदील है.

बात सरदार मिल्खा सिंह भटिंडा वाले की

आपके मन में सवाल आया होगा : यह बाबाजी कौन ? उनके 'गल्लों दी' बात कहने की क्या कहानी है ?

मेरे पड़ोस में एक सिख परिवार रहता था. बाबाजी उम्र कोई ७० के करीब होगी एक दफा बीमार हो गए. डॉक्टर की राय थी उनको माईल्ड कार्डियक स्ट्रोक हुआ था, कोलेस्ट्रोल का कण्ट्रोल ज़रूरी था.........खाने पीने का परहेज़ ज़रूरी...घी/मख्खन कम खाना...
अब सरदार मिल्खा सिंह भटिंडा वाले खूब खाए खेले, भैंसे थी, मुरबे (खेत) थे, दूध, दही, घी, मख्खन खूब खाया और आदत भी वैसी ही. यह तो बेवक्त रब ने सरदारनी दीपेंदर कौर को अपने पास बुला लिया, बड़ी बहु-बेटे से सरदारजी की नहीं पटी तो आकर लैंड कर गए हैदराबाद में जहां छोटा परमिंदर आईटी कंपनी में लगा हुआ था. हाँ तो सरदार मिल्खा सिंह भटिंडा वाले के खाने पीने पर रोक लग गयी...बहू रुखी रोटियां खिलाने लगी.....दाल में भी तड़का बंद...पराठोंपर मख्खन का क्या काम....सरदारजी अन्दर से परेशान मगर क्या खूब टेक्निक निकाली, मुझे बुला कर पंजाब की बंटवारे की बातें सुनते, कुछ ओरिजिनल जोक-सोक भी...फिर कहते बहू बेटे खूब ख़याल रखतें हैं, पूरा परहेज़ से रखते हैं, बहू क्या है माता का स्वरुप है खूब प्यार से खिलाती है, बेटी कीतरह स्नेह देती है.....बेटा तो कंप्यूटर की तरहा नाप-तोल वाला है...यह पंजाब दी पुत्तरी है..इत्यादि. समय के साथ साथ बहू का सोफ्ट कॉर्नर हो गया ससुर के लिए. एक दिन सरदारजी बोले, बेटा परांठों पर थोड़ा बटर लगा दो अच्छे से और आज तड़का भी थोड़ा तगड़ा लगाना......

छोटी सरदारनी बोली, "बौजी, आप तो पूरे परहेज़गार है, प्रोफ़ेसर साब को परहेज़ पर अच्छा भाषण देते हैं.....यह क्या ?"

बुध सरदार बोला, "ओये कुड़ी, कुछ गल्लें कहने दी होंदी है होर कुच्छ करने दी..
मैं पंजाब दा पुत्तर तू पंजाब दी पुत्तरी यह मद्रासी डॉक्टर की जानदा है..."

मैंने सुना, और मुझे यह जुमला बड़ा अअपील करने लगा.

रोता हूँ मैं...........

(यह टिपण्णी रचना लिखने के समय की है )

अमूमन मैं आप सब कि रूचि के अनुकूल ही रचनाएँ यहाँ पोस्ट करता हूँ, आज एक घटनाजनित दुःख था मुझे इसलिए मन शांत करने हेतु यह शब्द लिखे थे मैने।आप मेरे आत्मन हैं , अपने हैं, इसलिए शेयर कर रहा हूँ.यदि अच्छा ना लगे तो बस इग्नोर करियेगा.किसी ना किसी रूप में यह रचना आजकल के तथाकथित धर्माधिकारियों कि असलियत बयान कर रही हैं,वे चाहे कोई भी हो और हम सब उनके चंगुल में फँस कर और अधिक सुसुप्त होते जा रहे हैं.

रोता हूँ मैं...........

# # #
आदि शंकराचार्य
मेरी दृष्टि में
एक आन्दोलन थे
व्यक्ति नहीं,
सदियों में कभी कभी
आतें हैं ऐसे क्रांतिदूत
अपने अनुभवों को
बांटने और जन-जन को जगाने,
स्थापित किये थे उन्होंने
कई केंद्र जहाँ से ज्ञान
भक्ति और साधना का
आलोक फ़ैल सके
सारे भारतवर्ष में,
हर सोच में क्रांति थी
करुणा थी समझ और प्रेम था......
कालांतर में पीठ और मठ
बन गए थे गद्दियाँ
अहम्-पोषण की,
ज्ञान और अनुभूति की
जगह ले ली थी
"Holier than thou." के
Attitude ne...,
जगाने की बातें हो जाती थी
कभी कभार मंचों से,
अधिकांशत लगता था ऐसा
यह भी एक युद्घ है बर्चस्व का,
जिसमें शब्दों और तर्कों का
किया जा रहा है
इस्तेमाल
अस्त्रों के रूप में...
घर संसार का त्याग
जिन्होंने किया
स्वयं की तलाश में,
ना जाने वो क्यों
यश लोलुपता
पद लोलुपता के
आधीन हो कर
क्या चाहते हैं पाना ?
मैं असली
तू नकली
यह मेरा आधिकार
यहाँ तुम्हारा क्या काम
सामान्य जन की तरह
लड़ते हैं
झगड़ते हैं,
खटखटाते हैं
न्यायालय का द्वार
करतें हैं
गुट-बंदी,
जब स्वयं
संग स्वयं के
ना हो सके एक
मिला सकेंगे कैसे
आत्मा को परमात्मा से ?
कैसे जगा सकेंगे लोगों को ?
कैसे बता सकेंगे रहस्य इस माया का?
कैसे लायेंगे एकता इस
विशाल देश में ?
जिसके हर कोने पर उस
मनीषी ने चमकाया था
ज्ञान पुंज........
जो चला था अकेला
सत्य ज्ञान कि राह पर,
रोता हूँ याद कर कर के
उस धार्मिक दिग्विजयी को
जिसने प्रेम, ज्ञान और शुद्धता से
जीता था
परम विरोधियों को
छोडा नहीं था उनको
अकेला
चला था वह
लेकर साथ उनको..........

(25 July, 2009)

मुल्ला कि मानसिक चिकित्सा......

मुल्ला नसरुद्दीन को हो गयी थी डर और घबराहट की मानसिक बीमारी याने 'फोबिया सिंड्रोम'. जब भी फ़ोन कि घंटी बजती, मुल्ला घबड़ा जाता----भयाक्रांत हो जाता. तरह तरह के दुश्विचार आने लगते जेहन में ---ग्रोसरी वाले ने बकाया का तगादा करने फ़ोन किया हो, मालिक मकान बाकि किराये के लिए डांटना चाहता हो, घर खाली करने के नोटिस कि खबर देनेवाला हो--- बॉस ने ऑफिस से कोई झाड़पट्टी पिलाने के लिए फ़ोन किया हो---सास ने बीवी की शिकायतों को डील करने के लिए फुनिया हो---किसी 'भाई' का कोई धमकी भरा फ़ोन हो----काबुलीवाले खान का क़र्ज़ वसूली के लिए धमकाना हो ,नाना प्रकार कि चिंताएँ मुल्ला को सताने लगती, फ़ोन कि घंटी के साथ. बस ऐसा हो गया कि मुल्ला के लिए फ़ोन उठाना मुश्किल सा हो गया. अपनी आदत के मुताबिक मैंने बिना मांगी सलाह दे डाली, "मुल्ला किसी मनोचिकित्सक को दिखा दो....इलाज करा लो...नहीं तो जीना दूभर हो जायेगा."
जिंदगी में शायद पहली दफा सर्वज्ञानी मुल्ला ने इस नाचीज मास्टर (प्रोफ़ेसर) कि बात मान ली.

दो तीन महीने मुल्ला का इलाज चला. दवाईयां दी गयी और काउंसेलिंग भी हुई. एक दिन मैं मुल्ला के घर गया, वह फ़ोन पर था. उस दिन मैंने उसे कांपते, घबडाते या डरते हुए नहीं पाया हालाँकि फ़ोन का चोंगा उसके कान और मुंह के बीच था. वह था कि बड़ी तसल्ली से बतियाये जा रहा था.....नॉन-स्टाप.
फ़ोन पर वार्तालाप समाप्त हुआ. मैंने मुल्ला से पूछा/कहा, " मालूम होता है कि इलाज कामयाब रहा...अब डर तो नहीं लगता ?"

मुल्ला ने कहा, " अचम्भे की बात है, इलाज ज़रुरत से ज्यादा फायदेमंद रहा."

मैंने पूछा, "अमां यार नसरुद्दीन हमें भी बताओ ना, ज़रुरत से ज्यादा फायदे से क्या मतलब ?"

मुल्ला लगा कहने, "अब तो हिम्मत आ गयी कि घंटी नहीं भी बजती तो भी मैं फ़ोन कर लेता हूँ. पाहिले घंटी बजने से डरता था, अब अभी अभी जो फ़ोन कर रहा था, घंटी बजी ही नहीं थी और मैंने मालिक मकान से बात शुरू कर दी, उसे डांट भी दिया जोरों से. प्रोफ़ेसर, वह इतना डर गया है कि बोलता भी नहीं उस जानिब से. चुप ! सांस कि आवाज़ का भी मालूम नहीं होता. अब बता हुआ ना ज़रुरत से ज्यादा फायदा."
मैंने सर पकड़ लिया. "हे प्रभु! यह क्या हो गया ? पहले मेरा दोस्त थोडा सा 'पगला' था और अब......."

नव-निर्माण

# # #

देखा गया है :

वो अपने आपको बहुत
कंजर्वेटिव कहते थे,
परम्पराएँ और रीतीरवाज
समाये थे रग रग में उनके,
हुआ करता था
प्रिय विषय उनके
करना चर्चा
पड़ोसियों, रिश्तेदारों या
असंबंधित लोगों के बाबत भी :
क्या पहनना चाहिए उन्हें?
कैसे रहना चाहिए उन्हें ?
अरेंज्ड मैरिज़ ही होती है अच्छी लव मैरिज से,
जो बच्चे माँ बाप की बात का
नहीं अनुसरण करते
बंद कर अपनी आँखें
होते हैं वे बिगड़ी औलादें,
चरित्रहीनता है
मैत्री पुरुष और नारी की,
गुनाह है
अधर्म है
खाना रेस्तरां में,
पढना विदेश जाकर
अपमान है
स्वदेश का,
बेहतर है देशी आयुर्वेदिक यूनानी इलाज़
एलॉपथी से,
लूटते हैं डाक्टर आजकल के,
बकवास है ब्यूटी पार्लर और जिम,
बिगाड़ती है
फेमिना,सावी, गुड हॉउस कीपिंग, कॉस्मोपोलिटन
इत्यादि पत्रिकाएं
घर की औरतों और लड़कियों को,
घातक है सेहत के लिए
जींस पहनना,
साड़ी है सब से उत्तम परिधान,
रहना होगा बहुओं को सर ढक कर,
करना होगा निर्वाह घूँघट परंपरा का,
नहीं है वाजीब बहुओं का शूट पहनना,
वेस्टरन्स ?????
ना बाबा ना ...
बहुओं के लिए क्या
नहीं माकूल बेटियों के खातिर भी,
बिगाड़ते हैं बच्चों को
टेलीविजन के कार्टून प्रोग्राम
डिज़नी, सिंचैन,कित्रेक्सू और पोगो,
हमारी संस्कृति है बस
रोटी सब्जी दाल चावल खाना ही,
पिज्जा, बर्गर, नूडल्स, चिप्स है सब विदेशी
और षडयंत्र है हमें नष्ट करने के,
गद्दार है हर इंसान
मज़हब विशेष को मानने वाला,
और एक 'दूसरे धर्म' ने
कर रखा है आवाहन
लेने गिरफ्त में हमारे लोगों को
पश्चिम से मिले धन के बूते पर,
बचाना है हमें
अपने लोगों को इस आत्मिक विनाश से,
पढना चाहिए सिर्फ हमें अपने शास्त्रों को
जेहन में जहर भरता है विदेशी साहित्य
बाहर की फिल्में सीखती है हमें
हिंसा और कामवासना,
करना बहिष्कार उनका है
बचाना खुदको,
संगीत पश्चिम का है बिलकुल कान-फाड़ू
हमें बस करना है रसास्वादन हिन्दुस्तानी मोसिकी का,
ना जाने ऐसे कई अर्ध-सत्य
या अर्ध-झूठ
बिना इल्म के
कहे जाते हैं,
क्योंकि अंधे खंडन में
नहीं करना होता परिश्रम और
विवेकपूर्ण मंडन नहीं होता
बात उनके वश की..........

कैसे कैसे होतें है ये लोग :
जेहमत नहीं उठाना चाहते
ज्यादातर लोग जानने सोचने की,
नहीं उठा सकते जोखिम
बदलाव को स्वीकारने की,
यथास्थिति को बना के रखना देता है आराम उनको,
बिना उठा-पटक के लगता है अच्छा बस 'राम राम' उनको,
कहते हैं : अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम
दास मलूका कह गए सब के दाता राम,
बेमतलब के ये पंगे बनाते हैं उनको कुछ विशेष
बिना कुछ जाने बिना कुछ किये
दे देतें हैं हम उन्हें महत्व अशेष,
कुछ लोग होतें है वाकई जानकार
लेकिन रखते हैं अपनी सोचों के दरवाज़े ढांप कर,
आग्रहों के होकर वशीभूत सच्चाईयों को ठुकराते है
कुंठाओं में पल शांत-चित्त हिंसक बन जाते हैं,
भूतकाल में जीने वाले ये लोग वर्तमान को नकारते हैं
सब कुछ समझते हुए भी बस पुराने को स्वीकारतें हैं,
एक भीड़ सी हो जाती है तैयार
जिसमें कुछ पहली तरह के और
कुछ दूसरी तरह के अधकचरे बन्दे होते हैं
अपनी समझ को इन बुद्धिशाली-बलशाली लोगों के पास
रख कर गिरवी स्वयं को धन्य समझते हैं,
अपनी संस्कृति के उत्थान और देशभक्ति के नाम
ना जाने क्यों अपनी रोटियां सेकते हैं...........

तो क्या करें :

पश्चिम का अन्धानुकरण गैर-वाजिब है
अपनी साबित हुई बुराईयों से चिपका रहना भी
कहाँ वाजिब है.........
हमें हर बात को भावना से अधिक विवेक से देखना होगा
मानवता में आये बदलावों को स्वीकारना होगा
कुछ बातें होती हैं बेमानी .....बस बदलाव कि प्रक्रिया का हिस्सा
ना जाने क्यों कुंठित लोग अपने घर सब कुछ करते हुए
दूसरों कि ज़िन्दगी में क्यों लगाते हैं घिस्सा
नयी पौध परम्पराओं के नाम कुछ बातों को मान सकती है
बशर्ते कि उन्हें बताया जाये तर्कसंगत आधार
हमें बनाना है नया भारत
बंद करो यह पुराने का बेसुरा राग और अँधा प्रचार
हमें करना है सृजन ज्ञान विज्ञान और आर्थिक साधनों का
एक समृद्ध देश में अध्यात्म कि भावनाओं का
मज़हब फिरकों को हमें निजी चुनाव समझना होगा
खाने पीने और पौशाक के मसलों को साधारण समझना होगा
जड़ कि बातों पर देकर ध्यान हमें देश को आगे बढ़ाना होगा
दोस्तों ! हमें अपने भारत को फिर से एक ताक़त बनाना होगा ..............


(यह रचना भी 'ओब्सेर्वेशन सीरीज़ से है )






Wednesday, July 22, 2009

जीवन मूल्य : 'फ्रीडम विथ रेस्पोंसिबिलिटी'

ऐसा हुआ था :
वह लड़की थी ना
भाईयों से अंतर रखा जाता था
हर बात में
खाना पीना पहन-ना पढना
व्यवहार और प्यार-सम्मान
सब में दोयम दर्जा,
किशोर अवस्था और वयसंधिकल
हर घटना चरम पर दिखाते थे
मुहांसे हो या कुछ और,
ऐसे में एक साधारण से दिखनेवाले
असाधारण सहपाठी से हो गयी थी
मुलाक़ात....
बातें उसकी देती थी सुकून
ज़ज्बा आगे बढ़ने का
लगा था दोनों को
बने हैं एक दूजे के लिए
खिल गया था उसका तन-मन
आ गया था उसमें अद्भुत आकर्षण
लड़का भी बुन-ता था सपने
लिखता था नज्मे उस को ले के
आँखों में उसके असीम प्रेम था
हर सांस में बस अपनी
प्रियतमा का वुजूद था
आदर्श उस किशोर में
कूट कूट कर समाये थे
साहित्यकार और पत्रकार बन-ने के
ख्याल उसको भाए थे......

फिर आया था एक तूफ़ान :

एक नव-कुबेर का सुपुत्र
कभी विदेशी बाईक और कभी देशी सिडान में
कालेज आता था
पढने से ज्यादा रौब ज़माने में
वक़्त बिताता था
नाभि के नीचे जींस बांधता था
कानों में बाली और हाथों में
मोटी घडियां लगाता था
हाथों में न जाने क्या क्या लटकाता था
जटा उसकी कभी ऋषि मुनियों से होती
कभी हो जाता था गाँधी कि तरह सफाचट
कभी गज़नी के आमिर सा बनता था रोड मैप
तरह तरह का केश विन्यास था
मुंह पर हिंदी-अमेरिकन गालियाँ होती थी
हर सही काम से उसे सन्यास था
बातें उसकी होती थी लच्छेदार
लड़कियों को फंसाने के जानता था कई किरदार
हमारी नायिका भी छोड़
उस पंकज उदास को
साथ हो गयी थी इस dude के
गाड़ियों में घुमाता था
बरिस्ता और डिस्को में ले जाता था
रेव-पार्टीज की वह उसकी संगिनी थी
नयी नयी पैंगे नायिका की अनगिनी थी
हमारा उदास रहा करता था ग़मगीन
कभी पौधों कभी फूलों को देखता था
डूबते सूरज के मंजर में खो जाता था
ना जाने क्यों उसकी एक झलक को तरस जाता था
उस दिन नायिका अर्ध नग्न अवस्था में
शहर के बाहर सड़क किनारे
बेहोशी कि हालत में
फैंकी पाई गयी थी
सुबह कि हेड लाइन ने उसके नशे लेने कि
आदत बताई थी
सहमति से हुआ था या बलात्कार
जो भी हुआ था टूटने के लिए काफी था
बाप के पैसे और रसूख से
बिगडा बेटा आज भी इतरा रहा था
हमारा उदास उस पल
अपनी बिछुडी साथी के भीतरी घावों पर
अपने धीरज और ईमानदारी से
मरहम लगा रहा था.........

मैं कहना चाहता हूँ :
परिवार का व्यवहार किशोरों को
भटका सकता है
कोई भी मतलबी उन्हें अपने
जाल में अटका सकता है
जीवन मूल्यों को जताना बताना ज़रूरी है
नयी पौध को
आजाद खयाली और आज़ादी ज़रूरी है
उसके साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है
पश्चिम से पहले हम ने आंतरिक आज़ादी का
पाठ पढ़ा था और पढाया था
बरसों कि गुलामी और गुलाम सोचों से
हम ने अपने आदर्शों को गंवाया था
आर्थिक उदारता ने बहुत कुछ दिया है
मगर ले लिया है हमारा मौलिक जीवन दर्शन
जिसमें बहुत कुछ है ऐसा जो
हमें एक 'फ्री लाइफ विथ रेस्पोंसिबिलिटी' को
सीखा सकता है
पश्चिम से पूरब को बहुत आगे ले जा सकता है..........

(जताना बताना=सिद्धांत और व्यवहार दोनों से प्रस्तुति करना)

(नयी वेशभूषा के मैं खिलाफ नहीं हूँ, यहाँ सिर्फ 'भैयाजी' के व्यक्तित्व को आपके समक्ष लाने के लिए उसको describe किया है )

Tuesday, July 21, 2009

कायर महबूब

कहा करता था वो अपनी गर्ल फ्रेंड से :

जिंदगी के सब सपने देखें हैं
मैं ने संग तुम्हारे
डूब जाऊंगा तेरे संग
छोड़ कर किनारे
हम तुम तो हैं
इक दूजे के सहारे
समाज, जाति परिवार, रूतबे और धन की
दीवारें गिरा देंगे
साथ जियेंगे साथ मरेंगे.........

हुआ यूँ कि यारों :

बाप ने धमकाया
धर्मगुरु के पास ले आया
लम्बे दहेज़ का लालच दिखाया
गर्ल फ्रेंड से ज्यादा स्मार्ट
डेम्सेल का स्नेप दिखाया
गरजते हुए करियर का
प्रोजेक्शन दिखाया
समाज रुतबे और खानदान
का ख्याल दिलाया है
माताश्री की बीमारी को बढाकर
इमोशनल अत्याचार कराया था
जिगरी दोस्त को ब्रीफ कर
बालक का ब्रेनवाश कराया था
युवक थ्योरिटिकल से
प्रैक्टिकल बन गया था
प्रेम का भूत न जाने
कहाँ चला गया था
रिंग सरेमोनी हुई
सोइलितैर कि अंगूठी ने
रही सही कसर पूरी कर दी थी
बाप कि बताई खलनायिका
हूर लग रही थी
चुनाव गलत था मेरा
मैं क्या जानू 'बालक' ने कहा था
बाप के सीने में विजय का
दरिया तब बहा था
भूतपूर्व जानम
लगने लगी थी गँवारन
कम्पेटिबिलिटी के सवाल
पर लगने लगी थी उतरन
अब तो इस लाडो को
बालिका वधु बनाऊंगा
माँ बाप का श्रवण हूँ
पुत्र-धर्म निभाऊंगा
सच तो है भैय्या
सब की जोड़ी वही बनाता
वही तो सब का भाग्य विधाता .........

मैंने महसूस किया था :

कसमे वादे प्यार वफ़ा
सब बातें हैं बातों का क्या ?
कोई किसी का नहीं है
झूठे वादे हैं वादों का क्या ?
चिलमी यार किसका ?
दम लगाया खिसका ....
भगवान बचाए मासूम लड़कियों को
ऐसे कायर कायर महबूबों से
इक्कीसवी सदी में भी कायम
दकियानूसी सूबों से
पहचान करनी होगी तुम्हे
सचे और झूठे की
खासियतें समझनी होगी
उंगलियाँ और अंगूठे की
पहली नजर के प्यार कि बातें
महज़ किताबी है
ऐसे इश्क मोहब्बत कि बातें
शायद नहीं ज़ज्बाती है
और भी बहुत कुछ है ज़िन्दगी में
इस मौसमी मोहब्बत के सिवा
सायिकोलोजी है कुछ और
बायोलोजीकल सोहबत के सिवा..........


(यह कविता भी 'ओब्जेर्वेशन सीरीज़' से है, जो रोज़मर्रा कि ज़िन्दगी में देखे गए वाकयों पर आधारित है, Love और infatuation में फर्क होता है.......या तो लोग इतने परिपक्व हो जाये कि दिल टूटने के हादसे को बर्दाश्त कर सकें, as a part of the game, अन्यथा किसी भी रिश्ते में गहरे उतरने से पाहिले आगा पीछा सोच लें......मैं 'फाल्लिंग इन लव' कि थ्योरी से सहमत नहीं मैं 'राईजिंग इन लव ' को मानता हूँ....यदि आपका जुडाव आत्मा के तल पर भी है तो धोखा नहीं होगा, किसी वज़ह से ज़िन्दगी भर का साथ संभव न भी हुआ तो साथ बिताये अच्छे पल एक हलकी सी tees के साथ क्यों न हो , जीने कि प्रेरणा देंगे. एक सनम चाहिए आशिकी के लिए वाला प्रेम उपरी तल पर होता है...जिसका अंजाम कुछ भी हो सकता है........दिल टूटने वाला......कुंठाग्रस्त जिंदगी वाला......F*** and forget wala bhi. चुनाव आपके हाथ में है.)

Sunday, July 12, 2009

That Moment (IV)

He left us and joined
His loved one
Leaving alone someone
Whom he couldn’t love
But he left a loved one
Behind too
Me: a little kid
Whom he loved
More dearly than life
Perhaps he weighed his decision
And left me behind
To fend for myself
Alone, powerless and
Unprovided for !
How on earth this decision
Took shape in his mind
Is what irks me till this day
He realized the ramifications
Of his action : no doubting that !
No way it was a hasty and careless action !
Life can never be discarded in this manner
He embraced me
And held me close for
Those unforgettable moments
I sense the warmth of his hug
And tremor of his hands till day !
He knew he was cheating me !
He should not have brought me
In this world
If the ultimate objective
Was betrayal and desertion…
God might have betrayed him
But he has no right to betray me
He fully understood
His child’s present and future
Would be mangled yet
He went through his decision.

And now I speak to myself :
O Paagal !
Certain human actions are inexplicable
They shall ever remain like that
How and why a mind reacts against
The grain, is impossible to gauge
Try not to torment your mind
By attempting unwarranted insights
Into your biological father’s inclination
Factors weighing on her tormented mind
Already passed into oblivion with him
Pagle ! commendable is your spirit
Which pulled you through the trials of
Being orphaned at the age of six !
Take lessons from that moment
Never re-live that
Nor allow anybody to
Live that…………………..

Friday, July 10, 2009

That Moment (III)

Kuchh vastvik/kalpanik kshanon ko aapse banta hai peechhli do angrezi kavitaon men....'That Moment' aur 'Then What Was This'.......kuchh padh raha tha fir se.....in kavitaon ke kram men yathest roop se samanjasya sa prateet ho raha tha...socha kyon na ise aek kavita ke roop men bant liya jay aap se. Iska unvan de raha hun...."That Moment III' pahli do ko aap 'That Moment I & II' man lijiye......

Yah poem jo main post kar raha hun, kaha ja sakta hai observation aaur anubhav mere/hamare hain shabd 'god' liye hain.......

Aaam khaane se matlab, ped gin-ne se kya, mujhe bhi anand aaya padh kar soch kar, aap bhi mera sath dijiye.

Sabhi ko Salam !

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THAT MOMENT---(III)

We both were keeping up
The ceaseless reasoning
And counter reasoning
Tormenting our inner selves.
Only the GOD
‘Mera Ishwar’
‘Uska Khuda’
Would have been of help in
That moment……
We held hands
Her hand would tighten
Its grip on mine
Only to loosen it
Almost simultaneously
That moment……….

I stole clandestine glance
At her in perplexity
Expecting a hug
In the moment
Of her assent
Or
A contemptuous rebuke too….
That moment was unfathomable
She was neither happy
Nor sad
That moment and
Her visage betrayed
Neither joy nor outrage.
She looked oblivious to
The outpouring of
My feelings
That moment………

Was she ignoring my utterances
Taking them an overflow from
Imbecile mind-----
Or she was numbed
By the immensity of
That moment ……

I sensed discretion to be
The better part of chivalry
That moment
I derw back my hand
She too slipped her hand
Instinctively tightened
The hold
She looked into my eyes
Gave my hand a squeeze
And released it
That moment……….

How pleasant
And blissful--- was
That moment ………

Then What This Was......

(There is nothing great in this write......the usual stuff as all the poems of this type happen.......but felt like sharing those old moments with you all. The second part of this poem-----in next post)
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After vacation with her parents
At Munnar
She came on the third day
Of college reopen
I felt the entire surrounding lively
The grass of the lawn was greener
The flowers at garden were smiling
The trees had become more compassionate
The color of building was with more sheen
The interiors were more soothing
Everybody walking seemed more energetic
The whole environment was
Bursting with joy and thrill
And I was finding myself all new
Full of enthusiasm and zeal
She met me and said
“Good Morning !”
Rather I was who met her
As I was eagerly looking for her
Since the first day of reopen
My eyes searching for her everywhere
I responded her words with a smile
And “morning”
Keeping all adjectives inside me
As the morning was not just ‘good’
It was to preced by
Millions of prefixes to describe;
Again a smile and pain….
Spoke I :
“I am tormented by your absence.”
If that was not love then
"What was this ?"
______________________________________________

यह पल ना जाने फिर कब आएगा…….

बागवान !
मत तौड
फूल को
यह तो
खुद-बखुद
कुम्हला जायेगा
मुस्कुराने दे इसे
चन्द और लम्हात
यह पल
ना जाने
फिर कब आएगा…….

रे निर्मोही पुजारी !
आज तो
पूजा के थाल को
रीता ही ले जा
बस सुन जा
सच बात को
जो नहीं बताई थी
पहले
किसी ने
तुझ को……

जहाँ तपे
साधक
वही
काशी है
जहाँ
गिरता है
फूल
वही
प्रभु के चरण है
किसी भी नाश से क्या
प्रसन्न हो सकता है
अविनाशी……

बागवान !
मत तौड
फूल को
यह तो
खुद-बखुद
कुम्हला जायेगा
मुस्कुराने दे इसे
चन्द और लम्हात
यह पल
ना जाने
फिर कब आएगा…….

जो मारते हैं
निर्मम प्राणी
वे पुनः आते हैं
काँटे बन कर
ना ही
खिल सकते हैं
ना ही
मुस्कुरा पाते हैं वो
कहाँ ऐसा
भाग्य
उनका कि
झर पाए
संग फूलों के
उन्हें तो
अपने पाप कर्मों का
फल होता है
भुगतना…….

पगले !
फिर पश्चाताप करने से
कैसे छूटेगा
लाख चौरासी का बंधन
जाग ऐ सोये मानव !
जगाले ज्योत
चैतन्य की
इस रात का तिमिर
भाग जायेगा………..

बागवान !
मत तौड
फूल को
यह तो
खुद-बखुद
कुम्हला जायेगा
मुस्कुराने दे इसे
चन्द और लम्हात
यह पल
ना जाने
फिर कब आएगा…….


( एक मनीषी के सद्वचनों से प्रेरित)

Monday, July 6, 2009

That Moment.....

My eyes
Just stopped on you
In that crowd of
Beauty,brain and aristocracy....
I ignored you
I looked this side'right'
I looked that side 'left'
Evading the center
My center of attraction
My eyes battled
With my heart !
This could not last long
My heart conquered
The mind and all
I placed by foot
Proudly on my ego
Forgetting who I am
Twisted my eager eyes
Back towards you
And found you were also
Looking for me
The time stopped for a while
It was raining inside me
My whole being was splashed
I was dumb
Totally speechless
And that moment was
My essence
Your essence..........

Saturday, July 4, 2009

Healing......

Our mind is conditioned
With listening and listening:
‘We are born fighters’
‘Man achieved all by struggling’
And therefore
We have acquired habit of
Fighting with everything
Even against ourselves………

We repeatedly assert :
We strive to attain
Love
Peace
Innocence
Joy
Forgiveness
Inner strength
Awareness
Even healing……
AND thus
We lose harmony
With the existence
With the being…………

Ultimate healing
Comes from recognizing
We are connected to all
That is…. ‘the being’ … ‘the existence’
The ebb and flow of our mind is
Part of immense and infinite
Ocean of life;
Let us deepen our awareness
Of nature’s energy
Around and within us
Let us surrender our
Thriving but striving ego and
Loving self to HEALING………

संघर्षशील हैं
इस नारे को बार बार
क्यूँ दोहरा रहे
शांत चित्त से
सम्मुख प्रकृति के
क्यों ना समर्पित
हो पा रहे….

त्याग विरोध
पाएंगे एकत्व जब
हम समस्त अस्तित्व से
बनेंगे निर्मल
होंगे मुक्त हम
मिथ्या भ्रम-भाव
‘कृतित्व ’ से………..

बरसेगी अविरल
अमृत धारा
अंतर मन पावन होगा
संतप्त मानसिकता हेतु
क्षण वह
सहज सुशीतल
सावन होगा………..

Friday, July 3, 2009

शांति : Healing Series

Peace !
Peace !
We shout without
Feeling peace within
This begin from within
Never from outside......
To be at peace is
To be in harmony with
Everyone and everything
Surrender to peace and
Feel the pleasure of
Stillness and
Silent contemplation
Return to your
Natural State
Let stillness and peace
Flow
Around and within
And feel
Your whole being...........

ॐ शांति
ॐ शांति
मेरे अन्तकरण में
शांति
मेरे आसपास शांति
पृथ्वी पर शांति
अन्तरिक्ष में शांति
जन-जन में शांति
शांति, शांति शांति.............

Thursday, July 2, 2009

क्षमा : healing Series

Always we take care
Or pretend
Or like to
Treat others gently
But never take this
Seriously
In relation to ourselves.
Let us treat ourselves
Gently
Let us include forgiveness
In our nature
Forgiveness enable us to
Release the pain of anger,
Shame and guilt.
Let us affirm our willingness to
Forgive and to be forgiven
So as to heal our
Whole self.............

क्षमा पथ है
एक दिशा का
जिसमें केवल देना है
क्या सोचे क्या करे
दूसरा
हमको क्या लेना देना है
हल्का करना है स्वयं को
नाना कुबुद्धि विकारों से
करना मिलन है हम को
ईश्वर के हरकारों से..........

Wednesday, July 1, 2009

Love -The Healer

Love
We receive
Love
We give
Accelerates the
Process of healing.
Greatest lesson and
Task of life is
How to give Love
How to receive love
The moment
We learn
Loving freely and
Unconditionaly
We realize
Love alone can heal....
Love alone can heal....

आओ मेरे दोस्त !
हम-तुम अपने
दर्दों को भुलाएँ
आओ ना हम अपने
घावों को सहलाएं
धोएं पौंछे
और प्रेम की
मरहम लगायें.........

Inner Strength-आत्मा की ज्योति

Deep within us
Resides
infinite source of strength......
Whenever
There happens
Difficult moments in life
Unlimited strength
Flows from the soul
The strenght of body may
Change and decline
With the passage of time
BUT
My friend !
The strength of soul
Endures into eternity
Grows with our
Recognition of SELF
Whom we call
PARMATMA............
The almighty

चलो ना !
जागरूक बन
आत्मा की ज्योति जलाएं
परमात्मा को
देख पायें
शक्ति से भर स्वयं को
मनवांछित
सुफल पायें
बिना फल की आकांक्षा के
बिना प्रतिदान की प्रतीक्षा के........