Thursday, February 10, 2011

भ्रमित (आशु रचना)

(इसमें कुछ अजीब से शब्द इस्तेमाल हुए हैं. 'छोडा' : जब खाती (बढई) अपने 'रंदे' से लकड़ी छिलता है तो जो परत उतरते हैं उन्हें राजस्थानी में छोडे कहा जाता है. 'जाटा काम जड़ीन्दा है' एक राजस्थानी कहावत है जिसका मतलब यह है कि जाट जब भी कुछ गांठ लगाता है वह पक्की होती है या और भी कोई काम करता है वह पक्का होता है चाहे उसमें सोफेस्टीकेशन और फिनिशिंग हो या ना हो. कमंद उर्दू में रस्सी को कहते हैं, फक्कड़ गीतों में तुक मिलाने के लिए शब्दों को ऐसे थोड़ा सा तोड़ा मरोड़ा जाता है इसलिए कमन्दा कहा है. ऐसे ही कहीं कहीं और शब्दों को भी फकीरी टच दिया है, यह वैराग्य की सूफी स्टाइल रचना है, लुत्फ उठायें.)

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भरमित
मत कहो
मुझ ने
यारां !
मैं सावण का
अंधा हूँ...
हरियो हरियो ही
दीठे मोहे
मैं कुदरत का
बन्दा हूँ...

कभी कहे
तू मोहे
अजणबी ,
कहे कभी मैं
चन्दा हूँ,
बुझने की
घड़ी
आई रे साधो !
बुझता दीया
इक मंदा हूँ..

छोल छोल
छोडे करि डारे
मैं खाती का
रंदा हूँ,
पीरतम से
यूँ दूर भया मैं
खुद पर ही
शर्मिन्दा हूँ..

अपणो
मालक
हूँ मैं लोगां,
अपणो ही
कारन्दा हूँ,
पिराण हर लियो
खुद ही खुद को
बो फांसी रा
फंदा हूँ....

टस से मस
ना होवूं मैं तो
जाटा काम
जड़ीन्दा हूँ,
हंसाब सांस रो
मत जोड़ बाणियां
देख ना
अब तक
ज़िंदा हूँ...

अरथी से मोहे
बांधा जिसने
खुद मैं ही वोह
कमन्दा हूँ,
काफण हूँ मैं
मैं काठ सुख्योड़ा
खुद मैं
अपणा
कंधा हूँ...

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