Wednesday, July 14, 2010

कृतज्ञता......

# # #
कृतज्ञता
होती है
अभिव्यक्ति
संवेदनशीलता की
दूसरे के
अंतर्मन को
छूने की
किसी के
भावों को
समझने की………

कृतज्ञता के लिए
वांछित है
मन की
उदारता,
होती है
अनुभव
प्रसन्नता
देने में
बस देने में
क्योंकि :
विस्तार है देना
संकुचन है लेना…..

कृतज्ञता ज्ञापन
प्रतिफल है
आत्मविश्वास का
स्वयं-आस्था का
विनम्रता का
अन्तः बाह्य की
एकात्मकता का…….

कृतज्ञता है
एक स्थिति
जहाँ नहीं है
अपेक्षा
नहीं है
आसक्ति
नहीं है
विरक्ति
है बस प्रेम
प्रेम ही प्रेम……….

मेरे अहंकारी मन !
जो भी हुए हैं
कृतज्ञ
तर गए,
प्रेम के निशाँ
कोटि हृदयों में
रख गए,
मेरे ह्रदय में
बसे परमात्मन !
दे मुझे भी
आलोक
कृतज्ञ होने का……..

No comments:

Post a Comment