Saturday, July 10, 2010

प्रश्न द्रौपदी के......

(पांडवों का शिकार होना मामा शकुनी और कौरवों द्वारा रचित षड्यंत्र का या राजसी दुश प्रवर्तियों से जनित दुष-परिणामों का. उनका हार जाना अपना सर्वस्व जुवे में यहाँ तक कि अपनी पत्नी द्रौपदी को भी जिसे वह एक सम्पति के मुआफिक दांव पर लगा बैठे थे. दुशासन का द्रौपदी को केश पकड़ कर कौरव सभा में निर्दयता और निर्लज्जता पूर्वक ले आना,,, चीर हरण कि असफल चेष्टा और पांचाली की लाज बचाने हेतु पूर्णपुरुष श्रीकृष्ण का मैत्रीपूर्ण अवदान..
इस कविता में क्रिंदन करती द्रौपदी के उन प्रश्नों को समाहित किया गया है जो उसने सभा से और वहां उपस्थित महापुरुषों से किये होंगे)

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स्वर में था
आर्त्त,
करनेवाला
विदीर्ण
हृदय को,
प्रश्न कर रही थी
द्रौपदी
उस सभा
श्रधेय को.....

आचार्य गुरु द्रोण,
कृपाचार्य,
गुरुपुत्र अश्वथामा !
क्यों हो मौन,
नहीं पहुँच रहा
कृन्दन मेरा
क्यूँ
आप सब तक ?
सहना होगा
नारी को
आत्याचार
पुरुष का
कब तक ?

नारी की वत्सल
कोख से उत्पन्न
हे शक्तिशाली पुरुषों !
नारी का
यह करुण विलाप
क्यों नहीं करता
जागृत आपके
पुरुषत्व को ?
दुग्धपान
मातृ स्तनों से
करके भी
कर रहे है आप
क्यूँ
लज्जित
मातृ रूप
नारीत्व को ?

हे अंगराज कर्ण !
इस सती को हरा
आप सम
किसी पुरुष ने
कपटी द्युत
घृणित की
गोट में,
क्या मिलेगा
सद्य स्थान उसे
आपके
अजेय अभेद्य
अभिन्न
कवच की
औट में ?

हे धर्म राज !
हे कुरु सभा !
मेरा यह प्रश्न है
दोनों को
संबोधित,
हारा है जिसने
निज जीवन इसी
द्युत पटल पर
वह नर स्वपत्नी को
रखे
किसी दांव पर
क्या है ऐसा
अधिकृत ?
पति खेले
पत्नी को कर
प्रस्तुत
मानो
वस्तु हो कोई,
जघन्य कृत्य
ऐसा किसी का
क्या है धर्म से
सम्मत ?

हे पितामाह !
परशुराम शिष्य
भीष्म दृढ प्रतिज्ञ !
ज्ञात मुझे है
छवि आपकी है
अति-पवित्र,
किन्तु क्यों मौन आप है
मस्तक अपना नीचे कर ?
हुआ है कैसे
स्वीकार्य आपको
यह पराजित
जीवन चारित्र ?

हे सुधि सभासदों !
सभागृह
यह होता
प्रयुक्त
विमर्श अश्वमेघ
दिग्विजय
वरण करने को,
प्रतिबद्ध
आज क्यों है यह
अबला सम्मान
हरण करने को ?


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