Tuesday, July 20, 2010

सफल भूमिका....

# # #

होतें है महसूस
एहसास के रिश्ते
बिन देखे
बिन बोले
बिन पहचाने
थोड़े से जाने
थोड़े अनजाने...

एक अंश प्रभु का
तुझ में है
मुझ में भी
हैं इसलिए हम सगे
जुड़े एक दैविक संबंध से
हुआ आगमन पूर्व तुम से
मेरा इस जनम में
कह रहा हूँ
भाषा इस जहाँ की
मैं हूँ पिता तुम्हारा
मैं हूँ माँ तेरी भी....

जिस मग पर बढ़े हैं
डग दृढ़ हो तुम्हारे
ज्ञात है तुम को भले से
उसकी जीवन-सार्थकता
कोई अधूरी यात्रा;
कहीं कर दे ना
यूँ ही पैदा
ग्रंथि अधूरेपन की
भ्रांति असहाय होने की
समझनी है तुझ को ही
व्यापकता इस आशय की
महत्ता इस विषय की...

परदेश गये
अपनों का एहसास भी
जगाता है भाव
स्नेह और स्मृति का
संयोग और नियती का
अदृश्या अपनत्व का
समग्र अस्तित्व का
विस्तार है यह जीवन
बस इसी का…इसी का....

मिलते रहेंगे संगी
बनते रहेंगे कारवाँ
जीवन-यात्रा में
साथ होंगे तुम्हारे
एहसास अपनों के हमेशा
करेंगे स्वागत तुम्हारा
मंज़िल के मुकाम पर
वह प्राणधिक प्रिय
जो हैं अदृश्य किंतु
अजर है अमर है
निकट है बहुत
चाहे हम से दूर है....

मृदुल स्मृतियाँ
प्रेरक भाव
स्नेहिल स्पर्श
होते है अति -शक्तिमान
देते हैं हर पल साथ
समयातीत हो कर
पाने उस लक्ष्य को
जो सांझा था संग उनके
जो बिछड गये हैं
देकर दायित्व तुझ को
उसे अपनाने का
उसे पूर्णरूपेण पाने का.....

विराट की कृपा
रहेगी सदैव संग तुम्हारे
सपने होंगे साकार
यथावत तुम्हारे
शक्तिपुंज बन तुम
करोगे धूमिल सब सहारे
पाओगे पूर्ण व्यक्तित्व
चमकेंगे सब सितारे
लड़ कर तेज़ तूफान से
पहुँचोगे तुम किनारे
पहुँचोगे तुम किनारे.....

आत्मा है सत्य
और शरीर
सीमित तथ्य
ब्रहम है सत्य
जगत एक कृत्य
दो सच्चाइयों के
दरमियाँ
पिरोना है सूत्र तुझ को
यही होगी-भूमिका !
तुम्हारी सफल भूमिका ......

No comments:

Post a Comment