Sunday, July 18, 2010

औढ ली चादर आत्म-विश्वास की (दीवानी सीरीज)

उसकी कृतियों के साथ मेरे शब्दों को भी इस पटल पर जगह मिली. किसी ने दर्द को महसूस किया, किसी ने साथ दिया, किसी ने इस आईने में खुद का अक्स निहारा, कुछ भी हो उसके लिखे को मेरे कलाम से ज्यादा पसंद किया गया.....लाजिमी भी है, उसने पूरी ईमानदारी से खुद के एहसासों को अल्फाज़ दिए थे.

उसने पढ़े होंगे यह सब पोस्ट्स तभी तो अचानक उसका लिखा एक ख़त ...ना ना ख़त नहीं...पैगाम...शायद वह भी नहीं...चलिए उसके पेन से निकली एक तहरीर मुझ तक पहुंची है, आप से शेयर करने की इज़ाज़त चाहता हूँ.
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मैंने
आत्म विश्वास की
चादर औढ ली है.

स्मृतियाँ
सूर्यास्त के बाद
गौधुली में चिपकी
धुंधली पड़ रही है...
स्वाभाविक धरातल
पा रही हूँ मैं....

निस्पंद धडकनें
मीठी गति से
लौट आयी है...

मैंने
आत्म विश्वास की
चादर औढ ली है...

मेरी बात....

आज भी वो वैसी की वैसी है, दिल में कुछ जुबाँ पर कुछ, इसे उसकी बेईमानी या पाखंड नहीं समझिएगा, एक अभिव्यक्ति का अनुपम ढंग है...उसका विशिष्ठ सा.
स्वाभाविक सहजता से उसने स्वयं की पहचान पा ली है, उसने स्वयं को चाहना आरंभ कर दिया है....आत्म विश्वास आ रहा है तभी तो गौर करिए पहली और आखरी पंक्तियों पर:

"मैंने आत्म विश्वास कि चादर औढ ली है."

मेरे मन में उपजे भाव यहाँ लिख रहा हूँ, शायद चुपके से वो भी पढले……..
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क्यों
औढा है
तुमने
उपरी
आवरण,
स्वयंस्फूर्त
आत्म विश्वास
देखा है
सदैव मैंने
तुम्हारे
हरएक
स्पंदन में....

स्मृतियाँ अब
और
उभर कर
आ गई है
सन्मुख
तुम्हारे,
नकारात्मकता
होने को है
तिरोहित
धुन्धलाकर
शनै शनै
धरातल,
और
मीठी धड़कने
उपहार तुम्हारा है
तुमको....

मेरी परछायीं !
तुम मुझ से
बड़ी बन कर
पा रही हो
विस्तार
जीवन में....

यही तो मेरा
स्वप्न है
तू जीये
स्वयं के लिए
चाहे
मैं रहूँ
ना रहूँ....

बस प्रेम की
एक ही
सुर-सरिता
बह रही है
ह्रदय में,
ओंस की आस
मुझे अब
नहीं रही...


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