Tuesday, July 27, 2010

सुख स्वार्थी होने का


# # #
कहते हैं वे,
प्रेम करो
पड़ोसी से
प्रेम करो
दुश्मन से,
करो तुम प्रेम
औरों से,
मगर नहीं कहते
करो ना तुम प्रेम
स्वयं से....

बुनियादी बात है
जब करेंगे हम
असीम प्रेम
खुद से,
छलकेगा वह
और बहेगा
स्वतः ही
जानिब औरों के..

बांटना घटित होता है
तभी
जब हो कुछ
पास हमारे
जब प्याला प्रेम का
भरता है लबा लब,
छलकता है वह
घटित होता है तब
अर्पण
ना कि त्याग और दान,
कोई एहसान नहीं
देनेवाले का,
बल्कि शुक्रगुजार
हुआ जाता है
पानेवाले का,
जिसने किया
आत्मसात
उस उफनते,
छलकते,
बहते,
प्रेम के धारे को...

हो जाएँ हम
खुश
सुकूं और शांति से भरे
मौन और संतुष्ट
ताकि पहुंचे हमारा
भाव भरे पूरे होने का
सब तक..

बांटना बनता है
हर्षातिरेक,
दिया जाता है जब
बिना किसी याचना के,
बिना कुछ जताए,
बिना कुछ बताये.....

देना किसीको
होता है ज्यादा
ख़ुशी देनेवाला
पाने से,
हाँ तभी
जब हम बन कर
स्वार्थी करते हैं
खुद से
बे-इन्तेहा मोहब्बत,
असीम प्रेम.....

No comments:

Post a Comment