Monday, July 26, 2010

राहें.....(दीवानी सीरीज)

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'As usual ' उसे 'confuse' होना ही था:

जिन्दगी
भागी जा रही है
अनजान राहों पर.
खोज में
मंजिल के....

काश !
जान गई होती
अहमियत उन्ही राहों की
तो हो जाती
मंजिल आसान
कितनी.......


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काश मैं उसे समझा पाता:

कदम रखने से पहिले
राहों को
जान पायें गर
हो जाएगी
आसान मंजिल...
क्यूँ कि :
नहीं होगी
वे राहें
अनजानी स़ी,
ना जानने से
समझोगी कैसे
अहमियत उनकी...


वक़्त है
अब भी ,
प्रिये !
रुको,
सोचो और
समझो.
गर सही है
राह तो
बढ़ चलो तुम
रफ़्तार से,
और
गर हो
गलत राह पर ,
लौट आओ
जानिब मेरे,
जाती हुई
मंजिल को
और भी तो है
राहें....

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