Saturday, July 3, 2010

स्वर और सजिन्दा (दीवानी सीरीज)

अचानक उसका सन्देश आया है:

प्रश्न दीवानी के...
# # #
स्वर कहाँ खो गए ?
कितना
कलरव
करती
और
अपने गीतों से
रिझाती……
कहाँ गया
वह उत्साह ?
अब तो बस
आहें हैं
गुम-सुम
चीन्ठ्ती स़ी.....

किसने
कंठ में
धुआं सा
भर दिया
मानो
किसी ने
कंकर
खिला दिए मुझे
छाले
भर दिए मेरे
कंठ में.
कैसे गीत
सुनाऊं ?

लौटाना
चाहते हो
तो लौटा दो
मेरे स्वर
मुझ को....

प्रत्युत्तर विनेश का

निशब्द कर दिया है इस संवाद ने……कुछ उत्तर देते नहीं बन पड़ रहा है.वह स्थिति तो अब नहीं रही कि…प्रिये ! मैं लोटाउंगा तुम्हारे स्वर..तुम्हारे लबों से निकला एक एक लफ्ज़ मेरे लिए( ?????) है इत्यादि.

जो सोचें और भाव मन में हैं आप से शेयर कर लूँ….आप भी सलाह दे सकतें है ना कि क्या लिखूं जवाब में.
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# # #
संबंधों और
रिवाजों का
प्रदुषण
घेरे हुए है
तुमको
जब तक,
धुआं
कंकड़ और
छाले ही
आते रहेंगे
राहों में,
उस स्वर-लहरी के
जिसकी बोछारें
कभी
मुझ को
तुझ को
हम को
सब को
भिगोती थी
प्रेम की बारिश बने हुए.

बस हो जाओ
मौन
कुछ
समय के लिए
डुबो लो
स्वयं को
गहरे ध्यान में
पहचान होगी
तुझको
अपने सामर्थ्य की
अपने वजूद की
मेरा क्या
मैं तो
एक साजिंदा हूँ
महज़ साथ देने
तेरे स्वरों को…….
कर रहा हूँ

प्रतीक्षा
पुनः प्रस्फुटित
होने वाले
दैविक संगीत की
स्वरों की
सरगम की
और
आठवें सुर की…..

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