Wednesday, May 13, 2009

'आर' दम्पति -एक कहानी

राशी और रोहित बहुत खुश थे.भगवान का दिया उनके पास सब कुछ था. रोहित का ऑफसेट -प्रिंटिंग प्रेस का कारोबार बहुत अच्छा चल रहा था. अच्छी आमदनी से उनका जीवन-स्तर एक मध्यम-वर्गीय परिवार के मापदंडों से काफी ऊँचा उठ गया था. शहर के पॉश इलाके में अपना ओनरशिप -फ्लैट था, वेल फर्निश्ड , आधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्त. स्कूटर-सवारी से वे लोग ‘फिअट पद्मिनी’ में बैठ फर्राटे भरनेवाले हो गए थे.

विवाह के तीन साल बाद राशी ने रितिका को जन्म दिया था. और उसके ठीक दो साल के बाद राहुल एक और नन्ही ख़ुशी बन उनकी जिन्दगी में आ गया था. बच्चों की किलकारियां और चंचलता उनके जीवन में अनुठा लावण्य जोड़ रहे थे.शाम को जब रोहित घर लौटटा तो ना जाने कैसे खुशहाली का समय इतना तेज़ी से गुजर जाता कि मालूम ही नहीं पड़ता था. शादी के पहले दो साल घूमने फिरने और गूडी-गूडी रहने में बीत गए थे. उसके बाद बच्चों का जीवन में चले आना, और दिन-रात की ज्यादातर घड़ियाँ उनके नाम हो जाना लम्हों को मानो और रफ़्तार दे रहे थे. सब कुछ शुभ और मंगलमय, किन्तु राशी और रोहित व्यक्तियों के रूप में एक दूसरे को शायद समझ नहीं पाए थे, यद्यपि दोनों के बीच प्रगाढ़ प्रेम किसी भी मिलनेवाले को महसूस होता था. सभी के जुबाँ पर यही चर्चा रहती थी कि राशी और रोहित की जोड़ी बहुत ही बेहतरीन है, दोनों ‘मेड फॉर ईच अदर’ हैं. घट के अन्दर क्या बसा है कौन जानता है.
समाज के पैमाने सुख को मापने के अधिकांशत भौतिक और अर्ध-भौतिक होतें हैं: अच्छा रहना, अच्छा खाना, घूमना-फिरना, एक बेटा-एक बेटी, अच्छा बिज़नस, स्टेटस और इज्ज़त, परिष्कृत रुचियाँ, थोड़ा बहुत लिखना पढना, विदेश यात्रा, गहने-जेवर, छोटी-मोटी आर्थिक सहायता जरुरत-बेजरूरत-मंदों की कर देना, NGOs को चन्दा दे देना, धार्मिक अनुष्ठानों में शिरकत कर लेना, बच्चों का अच्छी स्कूल में पढना, अच्छा स्वास्थ्य, मियां-बीवी का अच्छा फिगर इत्यादि. आपसी समझ और मानसिक संतुष्टि शायद वैसे भी इस फेहरिस्त में शामिल नहीं है और ना ही वह दूसरों के सामने आ पाते हैं. यहाँ तक कि एक छत के नीचे रहनेवाले बीवी और खाविंद भी एक दूसरे की अंदरूनी फीलिंग्स को काफी हद तक नहीं समझ पाते. जीवन एक गति पर चलता है, और यह बिंदु कुछ ज्ञात, कुछ अज्ञात हो बस अपना महत्व नहीं प्राप्त कर पाते. बरसों से चली परम्पराएँ और परिभाषाएं समय के साथ छोटे मोटे संशोधनों और रूपांतर के बावजूद भी सटीक नहीं हो पाती. ऐसा ही कुछ हमारे “आर ” दम्पति पर भी लागू हो रहा था. जहाँ वे एक दूसरे पर ‘जान’ छिड़कते थे, वहीँ अपने अपने वुजूद और आपसी आदर को उभारने का शायद मौका ही नहीं पा रहे थे, क्योंकि सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था. देना लेना भौतिक स्तर पर इतना था, और इतना अच्छा जा रहा था की इन पहलुओं पर शायद नज़र ही नहीं जा रही थी.. कभी कभार छोटे मोटे झगडे खड़े होते, जो दोनों की सामायिक समझदारी से निपट जाते थे….और उसके बाद ‘दे लिव्ड हैपिली ’ वाली बात घटित हो जाती थी. आपसी समायोजन, संस्कारगत था अथवा प्रक्टिकल किन्तु आपसी समझ और अंतरंगता पर आधारित नहीं था.

तीव्रगति से चलती रेल-गाड़ी से जो दृश्य हमें दिखतें हैं और अचानक रूक जाने पर हम उन्हें भिन्न रूप में देख पाते हैं, ऐसा ही कुछ हमारे “आर ” दम्पति की दास्ताँ-ए-जिन्दगी में देखा गया. रफ़्तार से चली जा रही जिन्दगी में एक ब्रेक सा लगा…..जब डॉक्टर ने राहुल के लिए कुछ ऐसा बताया जो एक बज्राघात से काम नहीं था. राहुल चार वर्ष का हो गया था. तुतलाती जुबाँ से जब वह बोलता तो राशी और रोहित विभोर हो जाते थे. और जब उसकी धुन में धुन मिलाकर रितिका कुछ बोलती तो उनके मान मयूर नाच उठते. रोहित से ज्यादा राशी का वक़्त बच्चों के साथ गुजरता था. एक दिन शाम को जब रोहित घर आया, और राशी के संग बैठ शाम की चाय पीने लगा तो राशी ने कहा, “एक अजीब स़ी बात आप से शेयर करना चाहती हूँ, भगवान करे यह मेरा बहम हो.”
रोहित ने कहा, “ऐसी क्या बात है, मुझ से तुम जरूर कहो,.”
राशी बोली, “जाने दो….बस यूँ ही खाली दिमाग में आई ग़लतफ़हमी स़ी है…मैं तो बस…”
रोहित उत्सुक और चिंतित एक साथ हो गया, और राशी से पूछने लगा, “ जब मन में आ गयी है तो जरूर बताओ, नहीं तो तुम भी बेचैन रहोगी और मैं भी बेचैन…”

पुरुष को बाहर की चाहे जितनी बड़ी बातें मालूम हो या वे उसके ओब्ज़र्वेशन पॉवर के घेरे में आ जाती हो, लेकिन घर और जिन्दगी की बहुत स़ी बातें उसे स्त्रियों से ही मालूम होती है. कारण पुरुष जीता नहीं बस जीने के समान को जुटाने में ही लगा रहता है, और इसी की महत्ता को महिमा-मंडित कर अपने आपको सत्ताधीश समझने लगता है. रोहित भी अपवाद नहीं था. रोहित की दिनचर्या/रात्रिचर्या में, सुबह की सैर या गोल्फ, योग-व्यायाम, अख़बार पढना, बेड- टी ,ब्रेक-फास्ट, शाम की चाय, डिनर , टी वी न्यूज़, कारोबारी दिन, फ़ोन पर बातें करना, बच्चों के संग करीब करीब एक से खेल खेलना, बीवी के संग घर-संसार की सूचनाओं का आदान-प्रदान, बिस्तर का प्यार, छुट्टी के दिन दोपहर में सोना और शाम को बीवी के साथ सिनेमा या रेस्टुरेंट , कभी कभार दोस्तों के साथ बार में बैठना, त्यौहार पर्व के दिनों: मकसद बिना जाने बस पत्नि बच्चों के साथ मंदिर चले जाना… बस यही कुछ तो था…नपा तुला सा. और यही नाप तौल किया हुआ सब कुछ रोहित के लिए जीवन था, पारिवारिक जीवन….इससे जियादः अपने दिमाग को ज़ेहमत देना उसको गवारा नहीं था.

राशी ने रोहित को सुना. उसके रग-रग में बसे रिसीवर ने रोहित के वायिब्स को महसूस किया. अपनी चूड़ियों को थोड़ा कलाई से ऊपर चढ़ा,सावधान जैसी मुद्रा में हो कर, वह कहने लगी “राहुल जब भी चलता है, उसकी चाल में थोड़ा अजक सा लगता है. आप ने भी देखा होगा ?”
रोहित ने कहा, “राशी, मुझे तो बस उसकी हंसी और किलकारियां मुदित कर देती है, मैने कभी ध्यान से उसका चलना नहीं देखा. हाँ जब तुम ने कहा है तो अब जरूर ध्यान दूंगा.” थोड़ा रुक कर बोला, “क्यों ना अभी देखा जाये ?”

नन्हा राहुल थोड़ी दूर पर अपने खिलोनों से खेल रहा था, रितिका अपने होम-वर्क में शायद व्यस्त थी. राशी बोली, “रा….हु…..ल ! देखो पापा तुम्हारे लिए क्या लायें है ?”
राहुल ललचाया सा बालसुलभ ध्वनियाँ करता हुआ अपने परेंट्स की जानिब बढ़ने लगा. रोहित ने ध्यान से देखा उसके पांव कुछ अजीब तरहा से पड़ रहे थे. उसे भी कुछ अब्नोर्मलिटी का एहसास हुआ, मगर समझ नहीं पाया कि ऐसा क्यों है ? और सच में ही यह कोई किस्म का विकार है या राशी की बात सुनने के बाद एक सहज सा भ्रम.

“कल डॉ. गाँधी को दिखा देते हैं, अच्छा छोड़ो वह तो इसे हमेशा से ही देखते आये हैं, हम इसे डॉ. कपूर के पास ले चलते हैं जो शहर के जानेमाने ‘चाईल्ड स्पेशलिस्ट ’ हैं. हाँ उनका अपोइन्टमेंट मिलना जरा मुश्किल है मगर मेरे एक बिज़नस एसोसियेट की सिफारिश से शायद काम बन जाये.”

दूसरे दिन शाम को राशी और रोहित राहुल के साथ डॉ.कपूर के चैम्बर में थे.
डॉ.कपूर ने राहुल का जनरल -चेक-अप किया और उसे चला कर भी देखा. डॉ.कपूर कुछ गंभीर हो गए थे, लेकिन उन्होंने कहा कुछ नहीं कुछ टेस्ट्स लिख दिए और उसकी रिपोर्ट्स के साथ फ़ोन करके आने को कह दिया.

डॉ.कपूर ने टेस्ट्स कि रिपोर्ट्स को देखा और कहने लगे, “मुझे कहते हुए दुःख हो रहा है, आपका बच्चा एक असाधारण स्थिति के तहत है, जो आनुवंशिक है. मेडिकल भाषा में इसे ‘Duchennes Muscular Dystrophy’ कहतें है. इसमें बच्चे को क्रमशः कमजोरी से दो-चार होना होता है. मांसपेशियां शनै शनै नष्ट होती जाती है. इससे पीड़ित बच्चे को व्हील चेयर पर ही रहना होता है. २० से २२ वर्ष तक की आयु तक अधिकतम बच्चा जीवित रह पता है. यद्यपि विज्ञानं बहुत कुछ शोध कर रहा है , आज के दिन यह एक लाइलाज स्थिति है.”

सुन-कर राशी और रोहित स्तब्ध रह गए. राशी को तो ऐसा लगने लगा कि उससे उसका सब कुछ छीन लिया गया हो. डॉ. कपूर ने कुछ ‘प्रिंट आऊट्स ’, जिनमें इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी थी, उनको दे दिए और हिदायत दी कि उन्हें बहुत ध्यान से पढ़ा जाय. डॉ. कपूर स्वयं बहुत उदास थे, मगर हकीकत से तो मुंह नहीं चुराया जा सकता था. उन्होंने ‘ आर ’ दम्पति से कहा कि वे पोसिटिव सोच रखें, आस्तिक हैं इसलिए जो स्थिति है उसे अध्यात्मिक दृष्टि से देखें, हो सकता है विज्ञानं किसी नयी खोज के साथ चला आये. दूसरे दिन रविवार था. डॉ.कपूर ने उन्हें शाम की चाय अपने यहाँ पीने का अनुरोध किया. रात के दास बज चुके थे, नमस्कार कर भारी मन से “आर ” दम्पति अपने घर को रवाना हो गए. राशी की आँखों में आंसुओं की झडी लगी थी, और रोहित गुम-सुम सा गाड़ी ड्राइव कर रहा था. पूरे रास्ते, दोनों चुप-चाप थे. दोनों ही के मन में तरहा तरहा के ख़याल और सवाल उठ रहे थे. डॉक्टर से जो सुना वह किसी बज्रपात से कम नहीं था.

घर पहुच कर राशी बिना कुछ खाए और कपडे बदले बिस्तर पर गिर कर सुबकने लगी. सिसकियाँ थी कि थम ही नहीं रही थी. रोहित आते ही डॉ. कपूर के दिए लिटरेचर को पढने में लग गया. राशी पर क्या बीत रही थी, ऐसी असमंजस की हालत थी कि लग रहा था, मानो उस से उसको कोई सरोकार नहीं हो. यह नहीं कहा जा सकता कि रोहित दुखी नहीं था, किन्तु उसका दुःख कुछ अलग किस्म का था और ज्यों ज्यों वह पढ़ रहा था उसके मानसिक तंत्र में अजीब स़ी उथल-पुथल हो रही थी.चेहरे पर और ज्यादा तनाव छाये जा रहा था. उसने अपना लैपटॉप ऑन किया और ‘नेट’ पर Duchenne Muscular Dystrophy (DMD) के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकठ्ठा करने लगा. वह सब कुछ अशांत मन से कर रहा था और ना जाने क्यों उसके वाइब्स क्षोभ, नकारात्मकता और एक विद्वेष से भरे जा रहे थे, जब की इस स्थिति में राशी के वाइब्स में दुःख, मोह, करुणा और ईश्वरीय-सत्ता के प्रति आवेश था. बच्चे कब के सो चुके थे, आया बच्चों को लिए उनके कमरे में थी. और यह दो दुखी मानव बिना संवाद, दुश्चिंता से घिरे चुप चाप अपने बेडरूम में नींद और जागने की सोच से परे साँसे ले रहे थे.

समय का अपना क्रम होता है और मन-मस्तिस्क का अपना. कभी समय तेज़ी से जाता मालूम होता है तो कभी अत्यंत ही धीरे. यह सब मन की सोचों पर निर्भर करता है. सुकून और बेफिक्री की घड़ियाँ बस जल्द ही बीत जाती महसूस होती हैं.मलाल और उससे उपजे तनाव और दुश्चिंता के पल पहाड़ के समान प्रतीत होतें हैं. वह रात बहुत लम्बी थी, राशी के लिए भी और रोहित के लिए भी. राशी को डॉक्टर की बातें रह रह कर याद आ रही थी. वह अपने आपको राहुल के बिना नहीं सोच पा रही थी. राहुल अभी चार साल का था. आने वाला एक एक दिन कैसा होगा ? कैसे जी पाऊँगी मैं अपने लाडले को तिल तिल बीतते देख कर ? कैसा विधान है यह प्रकृति का ? राहुल बड़ा होगा, समय पाकर उसे भी अपनी बीमारी का मालूम होगा, कैसी बीतेगी उसके मन पर ? कैसे बड़ा करुँगी इस असामान्य बालक को ? रितिका के सोच भी इस बारे में कैसे ढलेंगे ? ऐसे ही कई प्रश्न घुमड़ रहे थे बेतरतीब से.

उधर रोहित सभी उपलब्ध सूचनाओं पर सोच रहा था, आज जो लाइलाज है कल हो सकता है कोई इलाज विज्ञान की रिसर्च मुहैया करा दें . तब तक ? और इसका कोई भी इलाज नहीं निकल सका तो ? अमेरिका के Muscular Dystrophy Association (MDA) की वेबसाइट भी उसने विज़िट की थी. जिसमें इस बीमारी के बारे में बहुत स़ी जानकारियां दी हुई थी. बच्चे के मैनेजमेंट से सम्बंधित भी बहुत स़ी बातें लिखी थी. बीमारी के कारणों पर भी विस्तार से चर्चा थी, जो की डॉ. कपूर द्वारा दिए गए लिटरेचर में बताये गए तथ्यों को ही एक अलग शब्दावली में प्रस्तुत करने का प्रयास था, ताकि ‘layman’ भी समझ सकें. उसके दिमाग में होती प्रतिक्रियाओं का यदि कोई चित्र लिया जाता या माप-जोख किया जाता तो जो नतीजा उभर कर आता उसमें ज्यादा हिस्सा बीमारी के कारण के इर्द-गिर्द घूम रहा होता;और थोड़ा सा हिस्सा अन्य बातों के मुत्तालिक होता.
सुबह को होना ही था, और दोपहर को भी. सब कुछ उदासी और तनाव से भरा हुआ था. रविवार का दिन इतना लम्बा कभी नहीं हुआ था. शाम को ४.०० बजे ‘आर ’ दम्पति डॉ. कपूर के बंगले पर थे. चाय तो एक बहाना मात्र था, असल मकसद तो मसले पर चर्चा करना और आगे की सोच को प्रोसेस में लाना था.

डॉ. कपूर कोई ६० साल के बुजुर्ग थे, जिन्होंने शादी नहीं की थी. कहतें हैं की डॉ. कपूर लुधियाना के किसी बड़े व्यावसायिक खानदान से थे. बचपन से उनकी रूचि साईंस और लिटरेचर में एक समान थी. वे बहुत ही ज़हीन और ज़ज्बाती इंसान थे. चूँकि कारोबारी जिन्दगी उन्हें कभी भी रास आनेवाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने अपने आप को साईंस और लिटरेचर के हवाले कर दिया था, और दोनों ही में उन्होंने महारत हासिल कर ली थी. देश विदेश में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और प्रसिद्ध बाल-रोग-विशेषज्ञ बन गए. उनकी कलम ने साहित्य के क्षेत्र में भी अपना कमाल दिखाया था. उनके उपन्यास, कवितायेँ, दार्शनिक और सामायिक विषयों पर निबंध बड़े चाव से पढ़े जाते थे.
डॉ. कपूर मानवीय मूल्यों और संवेदनशीलता के सजीव उदाहरण थे.

डॉ. कपूर ने राशी और रोहित का स्वागत किया. औपचारिक नमस्कार के आदान प्रदान के पश्चात डॉ. कपूर ने पूछा, “राहुल क्या कर रहा था ?”

राशी बोली, “हमेशा की तरहा खेल रहा था.”

“कैसे हो तुम लोग.” डॉ. कपूर का दूसरा प्रश्न था, जिसका जवाब दोनों से नहीं दिया जा सका. राशि की गीली आँखों और रोहित के तनाव भरे चेहरे में डॉक्टर की अनुभवी नज़रें जवाब खोज चुकी थी.
“रोहित साहिब ! एकेडेमिकली आप किस स्ट्रीम से हैं ?” पूछा डॉक्टर ने.
“जी मैने Physics (Hons) में B.Sc. की और उसके बाद एक बिज़नस स्कूल से MBA किया .” जवाब दिया था रोहित ने.
“राशी बेटा ! आपकी शिक्षा के बारे में हमें कुछ बताइए.” डॉक्टर राशी की ओर मुखातिब हो कह रहे थे.
“जी कुछ खास नहीं मैं ‘फिलोसोफी’ में M.A. हूँ. समझिये ग्रेजुएशन के बाद पढ़ना जारी रखना था.” राशी बोली.
उसके बाद बात-चीत परिवार, होबीस ,रीडिंग हैबिट्स , आदि पर बहुत ही संक्षेप और अनमने ढंग से हुई….लेकिन डॉ. कपूर इस तरहा उन्हें पिछली रात और अब तक की सोचों से कुछ दूर ले जा पाए. इतने में चाय आ गयी, जिसका दौर भी बहुत छोटा रहा, और इस दौरान भी डॉ. कपूर इधर उधर की बातें करते रहे, अपने बारे में.
चाय के बाद डॉक्टर ने कहा, “राशी और रोहित, आपने मेरे दिए लिटरेचर को देखा होगा ?
प्रत्युत्तर दिया रोहित ने, “जी मैने सारे राईट अप्स पढ़ डाले, यही नहीं इन्टरनेट पर उपलब्ध जानकारियां भी मैने हासिल कर ली है.”

“आप ने राशी से भी इन जानकारियों को शेयर किया होगा ?” बोले डॉक्टर.

रोहित की चुप्पी को देख, डॉ. कपूर बोले: “चलो मैं संक्षेप में थोड़ा बता देता हूँ.”

डॉ. कपूर तटस्थ भाव लिए, सहजता से कहने लगे:

“Muscular Dystrophy (MD) एक अनुवांशिक (genetic) बीमारी है जिसको हम लगातार शरीर को कमज़ोर करने वाली और अस्थिपंजर मांसपेशियों (skeleton muscles), जो की sharir के मूवमेंट्स को नियंत्रित करती है,के अप्विकास (degeneration) की स्थिति के रूप में देख सकतें हैं. राहुल को दुर्भाग्यवश जिस स्तिथि में अस्तित्व ले आया है उसे Duchenne Muscular Dystrophy (DMD) कहते हैं.

DMD लड़कों को ही प्रभावित करती है.”

पानी का एक घूँट लेकर डॉक्टर ने बात आगे बढाई:

“DMD basically is the result of mutation in gene that regulates dystrophin, A protein involved in maintaining the integrity of muscles fiber. अधिकांश लड़के १२ वर्ष की उम्र तक पहुँच कर चलने में असमर्थ हो जाते हैं, उन्हें व्हील चेयर का सहारा लेना होता है. कुछ वर्षों के बाद उन्हें सांस लेने में असुविधा होने लगती है और रेस्पिरेटर की मदद लेनी होती है. जीवन सम्भावना करीब करीब २०/२२ साल की उम्र तक की होती है. जैसा की मैने कहा था,फ़िलहाल इसको ठीक करने का कोई भी इलाज उपलब्ध नहीं है. पीड़ित लड़के को थोड़े से चैन का जीवन देने के लिए, फिसिकल थेरपी, रेस्पिरेटरी थेरपी,पेसमेकर आदि को अपनाया जाता है. अप्विकास की गति को धीमा करने के लिए stroids का उपयोग भी किया जाता है. हाँ इसमें से कुछ बातें मैं आप लोगों को पहिले भी बता चुका हूँ.”

इतना कहकर डॉ. कपूर थोड़ा रुक कर दोनों के चेहरों पर कुछ पढने लगे और बोले: “राशी, शायद आप कुछ पूछना चाह रही हैं.”

राशी रुआंसी स़ी बोली, “अंकल ! आपने जो जानकारी दी वह आपका विषय है, जिसके आप विशेषज्ञ हैं , इसके बारे में मेरे क्या प्रश्न हो सकते हैं. मैं आपके द्वारा बताई मेडिकल साईंस की बातों को बारीकी से समझ पाने की मन-स्तिथि में नहीं हूँ.मुझे तो बस यही पूछना है कि जब तक संसार में रहे, मैं अपने बेटे को कैसे पालूं और उसे किस तरह खुश रख सकूँ. एक माँ होने के नाते मेरे लिए सबसे जरूरी बात मेरे बेटे की ख़ुशी और कम्फर्ट लेवल है.”

यह कहते कहते राशी का गला भर भर आ रहा था. किसी तरहा वह अपने पर काबू रख पा रही थी, मगर ना-कामयाब हो रही थी.

राशी की बात सुन, रोहित को लगा कि इस सम्बन्ध में ऐसी बातें इतने बड़े डॉक्टर को पूछना शायद राशी की नादानी है, उसे डॉ. कपूर द्वारा दी गयी लिबर्टी को इस रूप में नहीं लेना चाहिए. उनसे तो हमें शरीर-विज्ञानं और चिकित्सा के बारे में अपनी जो भी जिज्ञासाएं है, पूछनी चाहिए. वह कुछ कहने जा ही रहा था, कि डॉ. कपूर ने हाथ दिखा कर रोक दिया. फ्लास्क से पानी का ग्लास भर कर उन्होंने राशी से पीने को कहा. डॉक्टर साहिब कुछ चिंतन कर कहने लगे:

“ राशी बेटा ! किसी भी प्यार करनेवाली माँ को अपने बच्चे से प्यार करना नहीं सिखाना होता जैसे कि किसी मछली को तैरना नहीं सिखाना होता. यह तो स्वयं-स्फूर्त होगा. बस थोड़ा सा चेतन होना होगा. यह ख़याल खास तौर पर रखना होगा कि आप लोग राहुल पर कोई दया-भाव नहीं दिखाएँ. उसके साथ आप लोगों का व्यवहार वैसा ही होना चाहिए, जैसे कि एक सामान्य संतान के साथ, उसे किसी भी तरह से यह एहसास ना हो कि उसको कुछ कंसेशनस दी जा रही है क्योंकि….उसे कुछ ज्यादा प्रेम दिया जा रहा है क्योंकि…ज्यों ज्यों वह बड़ा हो उसे क्रमशः उसकी बीमारी के बारे में जानकारी देनी होगी. एक सजगता के बीज आपको उसके मनोमस्तिष्क में बोने होंगे. उसे एक तमाशा या सहानुभूति का पात्र कत्तई नहीं बनने देना है. उसकी इस हालत के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराना है, यहाँ तक कि ईश्वर को भी. आप लोगों को जागरूकता अपनानी होगी, सकारात्मक सोचों के साथ आने वाले समय को बिताना होगा. मानसिक पहलू पर मेरी समझ में मैने काफी कुछ कह दिया है.
शारीरिक स्तिथि के बारे में उसके लिए योग्य डॉक्टर के निर्देशानुसार, फिसियो थैरेपी , सांस सम्बंधित चिकित्सा इत्यादि की पूरी व्यवस्था आप लोगों को रखनी होगी.नए डेवेलपमेंटस इस के इलाज और रख रखाव के बाबत होते रहेंगे, आप लोगों को अपडेट होना होगा.

उसकी पढ़ाई लिखाई, खेल, और मनोरंजन के लिए यथासमय आपको ऐसा कुछ करना होगा जिस उसे संतुष्टि मिल सके. आप का व्यवहार महज़ फ़र्ज़-अदाई नहीं होकर स्नेह और वात्सल्यपूर्ण होना चाहिए, तह-ए-दिल से.

यह मसला ज़ज्बात से ज्यादा समझ का है. उसका उचित लालन-पालन कर आप कोई त्याग नहीं कर रहे होंगे.

मैने शायद बहुत लम्बी तकरीर कर दी है. समय समय पर मुझ से आप मशविरा ले सकतें हैं, आपका साथ देने में मुझे सुकून मिलेगा.”

यह कह कर डॉ. कपूर चुप हो गए. कमरे में सन्नाटा था. अपनी आदत के मुताबिक डॉ.कपूर दोनों के चेहरों को पढ़ रहे थे.

राशी ने बस इतना कहा, “ थैंक यू वैरी मच,अंकल ! आपका आशीर्वाद और सहयोग हमारा सम्बल होगा.” उसकी रुलाई फूट पड़ी थी किन्तु चेहरे पर शांति थी…भय और दुष्चिन्ता नहीं.

अनायास ही रोहित पूछने लगा, “डॉक्टर साहेब, मैने काफी कुछ पढ़ लिया है, किन्तु इस बीमारी के सटीक कारण के बारे में, मैं आप से पुख्ता जानकारी चाहूँगा.”

डॉ. कपूर बहुत ही गंभीर होकर कहने लगे : “ जैसा की मैं कह चुका हूँ Muscular Dysptophy एक अनुवांशिक बीमारी है. इसका सम्बन्ध उन genes से है जो लड़के को विरासत में मिलते हैं अपने जनकों से. विज्ञान की भाषा में यूँ समझो, DMD is inherited in X pattern.gene that contains A mutation causing this desease is on X chromosome. Every boy inherits X chromosome from the mother and Y chromosome from father. Girls get X chromosomes : one from each parent, since both the chromosomes cannot have that genetic mutation hence the girl-child is safe, though she may be A carrier.”

रोहित ने पूछा डॉक्टर से, “यह भाषा मैं स्पष्ट: नहीं समझ पाया.. मुझे तो बस यही जानना है कि राहुल को यह बीमारी किसके genes में प्रॉब्लम होने की वजह से मिली. मुझे बस यही जानना है, राहुल को यह मुझ से मिली है या राशी से ?”

डॉक्टर ने कहा, “एक मेडिको के नाते मैं सब पहलू आपको बता चुका हूँ. इंसान माँ बाप दोनों से नाना प्रकार की बीमारियों और कमियों को इन्हेरिट कर सकता है, जो
की genetic होती है. इस केस में, राहुल ने यह बीमारी अपनी माँ से इन्हेरिट की है…मगर इसमें किसी भी दृष्टि से राशी का दोष नहीं है…..आपको इसे महज एक संयोग समझना चाहिए.”

"थैंक यू वैरी मच डॉक्टर साहब, आपने हम लोगों के लिए इतना कष्ट किया. अब इजाज़त दीजिये.” कह कर रोहित उठ खड़ा हुआ. राशी भी खड़ी हो गयी, आँखों में कातरता के भाव लिए हुए. ड्राईंग रूम में फैले स्पंदन (viberations) काफी कुछ कह रहे थे, मौन में भी.

रोहित और राशी ने डॉक्टर साहिब को नमस्कार किया और अपनी गाड़ी में बैठ घर की तरफ रवाना हो गए. रोहित कह रहा था, “इस हालत की जिम्मेदार तुम हो सिर्फ तुम. तुम्हारी एक कमी के कारण मेरा सारा संसार उजड़ गया. और संतान भी अब मैं पैदा नहीं कर सकता, ना जाने आगे आनेवाला/आनेवाली कुछ ना कुछ कमी को लेकर आये. बस राहुल का भी वक़्त मुक़र्रर हो चुका है, टाइम पास करना है. रितिका को भी कौन ब्याहेगा क्योंकि कहीं वह भी तुम्हारी तरह…….हे प्रभु, तुम ने क्यों किया ऐसा मेरे साथ.”

राशी चुप थी. घर में प्रवेश करते ही राशी ने राहुल को अपने सीने से जकड़ लिया, मानो कोई उसे उससे छीन रहा हो. और रोहित ‘शिवास रिगल’ का पेग बना रहा था.

जरी लाल-एक कहानी

जब जब मुझे अपने काम के सिलसिले में उस शहर में जाना होता है, मेरे अजेंडा में जरी लाल के साथ समय बिताना और बातें करना एक अहम् पॉइंट होता है. जरी लाल कोई अदीब, VIP, politician, सरमायेदार वगेरह नहीं, बस था एक आम इन्सान है, Municipal Corporation का एक भूतपूर्व सफाई कर्मचारी. गौर वर्ण, लम्बा छरहरा बदन, सौम्यता चेहरे पर, एक शांत व्यक्ति…ऐसी है जरी लाल की शख्सियत . कम बोलना, तौल कर बोलना, मुस्कुराते हुए अपना काम किये जाना यह है उसका चलन. मैंने उसे सबसे पहले जब देखा था, कई दिनों इरादतन उसको देखता रहा था.
सुबह जल्दी उठ कर कसरत और meditation करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा है. एक दिन भोर के कोई चार बजे होंगे, मैं कुछ गुनगुनाते हुए अनायास ही बालकनी में चला आया. सामने सूनी सड़क एक नदी कि तरहा बिछी हुई थी, निर्जन…दूर दूर तक कुछ भी नहीं था, सिवा पार्क की हुई देशी विदेशी गाड़ियों के और उन पर गिरी ओस की बूंदों के. हरे पेड़ भी शांत खड़े थे, मानो राम प्रसाद बिस्मिल की तरहा खड़े खड़े
नींद ले रहे हों. अचानक एक आवाज मेरे कानों में पड़ी….थोड़ी स़ी घर्षण की, थोड़ी गुनगुनाने की. देखता हूँ, Municipality का एक नुमाइंदा गली बुहार रहा है अपने लम्बे डंडे वाले झाड़ू से, साथ में है कचरा उठाने वाली बड़े बड़े लोहे के पहियों वाली हाथ गाड़ी. झाड़ू और पहिये सड़क के साथ घिस कर आवाज कर रहे थे और वह शख्स ना जाने कुछ गुनगुना भी रहा था शायद कोई प्रभाती:”उठ जाग मुसाफिर भोर भई …अब रैन कहाँ जो सोवत है, जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है….” या कुछ ऐसे ही लफ्ज़. यह आवाजें चुप्पी को तोड़ सहज ही में अपनी तरफ आकर्षित कर रही थी. सारा इलाका उस जनवरी की सुबह नींद के आगोश में डूबा हुआ था. पॉश इलाका था इसलिए, लोग देरी से सोते और देरी से उठते थे. अधिकान्शतः नाईट लाइफ के शौक़ीन जो थे, क्या हुआ मेरे जैसा एकाध वाशिंदा ब्रहम मुहूर्त को जानने समझने वाला था. हाँ तो बाद में मुझे पता चला कि उसका नाम जरी लाल था.

मैं मंत्रमुग्ध सा उसके हाथों को चलते हुए देख रहा था और प्रभाती के शब्दों को तो नहीं ‘धुन’ को आत्मसात करने की कोशिश कर रहा था. बहुत ही कुशलता से जरी लाल अपने काम को अंजाम दे रहा था, एक एक छोटे कागज के टुकड़े या पेड़ से गिरे सूखे पत्ते , या किसी के गफलत से या आदतन फैंके सिगरेट के टुकड़ों, ज़र्दे-गुटके के खाली पॉउच, या ऐसी ही कोई छोटी चीज को जरी लाल बहुत ही ध्यान से हटा रहा था. सड़क को बुहारने का उसका अन्दाज़ किसी सधे हुए साजिन्दे के सारंगी बजाने से कम नहीं था, और उसका कचरे की गाड़ी को हैंडल करने का अन्दाज़ भी अनूठा था. सब कुछ पूरी निष्कपटता और आनन्द से किया जा रहा था. कोई supervision करने वाला नहीं, फिर भी मजाल कि काम में कोई कमी रह जाये….और संग संग उसका वह भजन गुनगुनाना मानो वातावरण को संगीतमय बना रहा था. इस युग में जब कि अच्छे खासे स्टेटस वाले पढ़े लिखे लोग भी अपनी कामचोरी को जस्टिफाई करने में लगे हों, इस सफाई कर्मचारी कि ‘परफोर्मेंस ’ वाकई मनमोहक थी. मेरे मन में जरी लाल के प्रति एक सम्मान की भावना उपज गई. जरी लाल क्रमशः आगे बढ़ गया और मैं भी अपने नित्यकर्मों में लग गया. हाँ उसकी शख्सियत मेरे जेहन में अंकित हो चुकी थी.

दुसरे दिन सुबह मेरा एक इंस्टिट्यूट में व्याख्यान था. मैं venue की तरफ जा रहा था कि नुक्कड़ की चाय-दूकान पर मुझे वह शख्स दिखाई दिया…..मैंने ड्राईवर से गाड़ी रोकने को कहा और उस दुकान पर उसके करीब पहुँच गया. मैंने पूछा, “क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ.” उसने कहा, “नमस्ते प्रोफ़ेसर साहिब, मेरा नाम जरी लाल है, और मैं आपको जानता हूँ.” मुझे आश्चर्य हुआ कि वह अनजान आदमी मुझे क्यों और कैसे जानता है. खैर मैं जल्दी में था और शायद अवचेतन मस्तिष्क में उच्चवर्गीय पाखंड मुझे उससे डिस्टेंस बनाये रखने को भी प्रेरित कर रहा था, इच्छा होते हुए भी मैं कुछ नहीं बोला और वापस कार में सवार होकर रवाना हो गया. मेरे व्याख्यान का विषय उस दिन “एथिक्स एट वर्क प्लेस” था, और एक चतुर बुद्धिजीवी के रूप में मैंने उस दिन जरी लाल की कर्तव्यपरायणता इत्यादि का पूर्ण विदोहन भारी भरकम शब्दों में बांध कर किया था.

उस दिन के बाद जरी लाल को देखना, सुनना, और मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान करना मेरा भोर का रूटीन हो गया था. हम दोनों में एक अबोली स़ी मित्रता जन्म ले चुकी थी और धीरे धीरे पोषित हो रही थी. एक और दिन जरी लाल मुझे उसी चाय-दूकान पर नज़र आया, मैंने उसी दिन की तरहा उस की तरफ बढ़ गया, हाँ अब पाखंड नहीं था, यह उत्कंठा जरूर थी कि वह मुझे कैसे जानता है. प्रनाम-पाती के बाद, जरी लाल पूछ बैठा, “प्रोफ़ेसर साहिब, चाय पीजिएगा ?” उसके कहने में इतना आत्मविश्वास था कि मैं इंकार नहीं कर सका. भाप उड़ाते हुए चाय के कुल्हड़ हमारे हाथों में थे, जरी लाल मुझे किसी भी तरहा मुझ से कम नहीं लग रहा था, सम्मान के एहसास मुझे और उसको मौन रूप में महसूस हो रहे थे.

“सर, आपका लेख- बदलते समय में नैतिक मूल्यों की समीक्षा’ मुझे बहुत अच्छा लगा. किन्तु सारे विवेचन के बीच आपका नैतिकता और अध्यातम के अंतर पर चुप रहना मुझे नहीं रुचा.” आश्चर्य और हर्षातिरेक के उन क्षणों ने मुझे बता दिया था कि जरी लाल मुझे क्यों और कैसे जानता है. पत्रिका में लेख के साथ संपादक ने मेरा सचित्र परिचय भी छाप दिया था. मुझे मालूम हुआ कि जरी लाल ने १९६५ में मिडिल हाई स्कूल प्रथम श्रेणी में पास किया है …..शराबी पिता की अकाल मृत्यु हो जाने पर परिवार की जिम्मेदारियों के साथ एक अदद अर्ध-सरकारी नौकरी भी उसे विरासत में मिली थी. पढने का शौक़ीन होने के नाते जरी लाल बहुत कुछ पढता और सोचता रहता था. काम से काम, फिर पढना, लिखना, गुनगुनाना…बस यही थे जरी लाल के पैशन्स या हौबीस . ना उसे बिरादरी से मतलब था, ना Municipal Corporation की यूनियन बाजी से, ना अछूत और पिछड़ी जातियों की राजनीति से. मैं जितना ज्यादा उसके बारे में जान रहा था उतना ही स्वयं को बौना अनुभव कर रहा था. जरीलाल ने चाय की कीमत का भुगतान किया, नमस्कार कर एक सुझाव देते गया, “ सर आपने, अमृत लाल नागर जी का उपन्यास ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ पढ़ा है क्या ? हमारे जैसों के बारे में उसमें काफी कुछ लिखा गया है.” उसी दिन लौटते समय मैं यह पुस्तक खरीद लाया था और शायद दो सिटिंग में पढ़ भी गया था. मेरे और जरी लाल के वैचारिक आदान-प्रदान का यह सिलसिला उत्तरोतर बढ़ता गया. एक सहज सम्मान की भावना उसके प्रति मेरे मन में और प्रबल होती गई.

एक दिन कोई पांच बजे, मैं ध्यान में बैठा था कि कॉल-बेल बज उठी. दरवाजा खोला तो जरी लाल को सामने खड़े पाया. हाथों में उसके कुछ बण्डल सा था कपड़े का. कहने लगा जरी लाल, “नमस्कार प्रोफ़ेसर साहिब, सुबह सुबह आपको तकलीफ देनी पद रही है, कृपया आप मेरी बात ध्यान से सुने, जो जरूरी भी है और सोचने-करने वाली भी.”
मैंने जरी लाल को अन्दर बुला लिया. खड़े खड़े जरी लाल बोला, “ मेरा लाने का काम पूरा हो गया है, मुझे यह नवजात शिशु सड़क किनारे रखा हुआ मिला है….इसे तुरंत अस्पताल ले जाना है, गाड़ी निकालिए.” वह भी मन से कह रहा था और मुझ में भी यही गूँज रहा था, “बाकी बातें रास्ते में होंगी.” मैंने जल्दी से कपड़े बदले और गाड़ी निकाली . जरी लाल, मैं और वह शिशु, चाइल्ड हॉस्पिटल की तरफ मेरी उस ग्रे रंग की फोर्ड में ‘चाइल्ड केयर इंस्टिट्यूट & हॉस्पिटल’ की जानिब बढ़ रहे थे.

“आज ही की जन्मी है. मैं इसके माँ और बाप दोनों को जानता हूँ. इसकी गरीब माँ ने मजबूरी में क्यों इसको सड़क पर मरने छोड़ दिया, क्यों नहीं इस के बाप- बड़े बाप के बिगडैल बेटे ने इसको नहीं अपनाया, सामाजिक मूल्यों के संक्रमण काल की कैसी परिणीति है….इसके जवाब आप खोजते रहिएगा…..फ़िलहाल यह इस दुनिया में जीने लायक हो सके इसका बंदोबस्त करना है.” जरी लाल चुप हो गया था.

और मैं भी सिर्फ: “ह्म्म्म..” कह कर चुप हो गया था, शायद मेरी बड़ी बड़ी डिग्रियां और सुविधाभोगी बुद्धिजीवी मानसिकता मुझे रोक रही थी. या शायद ऐसे मौकों पर मानवीय संवेदनाओं को जन्म देने के लिए मैं नपुसंक हो गया था. जरी लाल ने आगामी योजना का अनावरण भी कर दिया, “पिता के नाम की जगह मैं अपना नाम लिखा रहा हूँ क्योंकि आप जैसे संभ्रांत व्यक्ति तो इस दलदल में फंसना नहीं चाहेंगे…..मुझे इसका तमाशा भी नहीं बनाना है…..मीडिया के लिए इससे जियादः चटपटी खबर शायद ही कोई और हो इसलिए इसे पुलिस और पब्लिक की नज़रों से भी बचाना है…..बस जैसे तैसे इसे बड़ा कर लूँगा, जितना हो सकेगा पढाऊंगा ….शादी नहीं की इसलिए पत्नि का सुख तो नहीं मिला बेटी का सुख तो पा लूँगा.”

जरी लाल ने अपनी बात कुछ इस तरहा पूरी की, “सर मैं नहीं चाहता कि एक और जरी लाल जैसी कहानी कि पुनरावर्ती हो.

अस्पताल आ गया था, मैंने पोर्च में गाड़ी खड़ी की, जरी लाल बच्ची को लेकर “इमरजेंसी ’ की तरफ बढ़ रहा था….मुझे कहते हुए, “सर आप हॉस्पिटल कि फोर्मलिटी का काम करा दीजिये, तब तक मैं डॉक्टर के हवाले इसको कर, दस्तखत करने आ जाऊंगा.”

पार्किंग-लौट में गाड़ी पार्क कर, मैं रिसेप्शन /एडमिशन काउन्टर पर पहुँच गया था. इस हॉस्पिटल का मालिक मेरा शिष्य डॉ. रोहित जैकब था और मैं उसको फ़ोन भी कर चुका था. मालिक होते हुए भी रोहित शिफ्ट ड्यूटी करता था, और उस समय हॉस्पिटल में ही था. रोहित भी चला आया.

“रोहित क्यों, कब, कहाँ और कैसे मत पूछना…..इस बच्ची को बचाना है….बड़ा करना है……पिता के नाम के खाने में बस मेरा नाम लिख देना, बाकि औपचारिकताएं कैसी पूरी करनी है, तुम समझना.”

“सर, मलका मैडम तो आपसे बिना शादी किये मिडिल ईस्ट में बस गई, क्या………”

“रोहित, MBA से पहिले तुमने MD किया था. बाइलोजी में तुमने ज़रूर पढ़ा होगा कि बच्चे को पैदा करने के लिए कोई नर और मादा होना ज़रूरी है, ऐसा ही कुछ इस केस में भी हुआ होगा….मगर पिता या तात हमारी संस्कृति में पालन करनेवाले को कहते हैं…और वो होऊंगा मैं….क्या इतना काफी है.”

रोहित आखिर मेरा शिष्य था, मेरी तरहा ही अजीब, तभी तो मेडिको होते हुए भी MBA किया था, और फिलोसोफी और अध्यातम में भी रूचि रखता था. जरी लाल पास में खड़ा सब सुन रहा था, बोला, “ ख़ुशी है प्रोफ़ेसर साहिब आपकी आत्मा जिन्दा है.”

आज ‘मैरी ’, मरियम’ या मृणालिनी हार्वर्ड में इकोनोमिक्स की रिसर्च स्कॉलर है, इस सबकान्टिनेंट में उसका रुरल डेवेलोपमेंट और माइक्रो बैंकिंग पर काम करने का इरादा है. शुक्रिया है, मलका का जिसने उसे माँ का प्यार दिया……और जरी लाल मुनिसिपलिटी की नौकरी छोड़ अनाथ बच्चों के लिए स्कूल चलता है. आज भी हम उसी चाय दूकान पर खड़े होकर चाय के कई कुल्हड़ पी जातें हैं……और हर विषय पर ना ख़त्म होने वाली चर्चा करतें है. आज तक मैंने नहीं पूछा और जरीलाल ने नहीं बताया कि मरियम के बाइलोजिकल पेरेंट्स कौन है. वह मलका और मेरी, याने बिन ब्याहे जोड़े की बेटी है. जरी लाल अंकल से मैरी नियमित रूप से बात करती है, उसके स्कूल के लिए कुछ ना कुछ भेजती रहती है. हाँ मृणालिनी भी अपनी माँ मलका की तरह सवाल नहीं पूछती. सभी ने वर्तमान में जीना जो सीख लिया है….और गुरु कोई टेलीविज़न पर दिखानेवाले चोगाधारी सन्यासी नहीं जरी लाल है.

Sunday, May 10, 2009

ज़िन्दगी

जन्म
और
मृत्यु
के बीच
जो घटित है
उसका
नाम है
ज़िन्दगी...............

तुम
कहते हो
जिंदादिली का
नाम है
ज़िन्दगी...............

मैं
कहता हूँ
कहकहों के
बीच
अश्कों को
घोल उनके
वजूद को मिटा
देने का नाम है
ज़िन्दगी...................

Thursday, May 7, 2009

अस्तित्व (दीवानी सीरीज)

अस्तित्व (दीवानी सीरीज)

उस ने एक दिन फिर मुझ से ली किताब लौटायी और उसमें एक खूबसूरत सा सफा मोड कर रखा हुआ था…जिस पर मोती से अक्षरों में एक कविता लिखी थी. किस की कृति थी यह जानना मुश्किल था…..किन्तु बहुत ही सहज और दिलकश थी....कम्यूनिटीज पर पोस्ट होती (उस ज़माने में कंप्यूटर भी नहीं था आम प्रचलन में) तो ‘बहुत सुंदर’ ‘ग्रेट वर्क’ ‘क़त्ल क़त्ल’ आदि की टिप्पणियां मिलती….लेकिन मेरा तो सर चकरा गया, कुछ भी समझ में नहीं आया, हाँ एक मीठा सा एहसास ज़रूर महसूस हो रहा था…. शब्दों और भावों के दूरगामी परिणामों से भी परिचित था….गरम काली कॉफ़ी का प्याला लेकर उस रात अपनी ‘स्टडी ’ में बैठा सोचता रहा……..क्या नतीजा रहा आप से शेयर करूँगा, रूखा सूखा.

पहिले उस सफे की लिखावट को आप से शेयर कर लूँ। आप भी व्यग्र होंगे इस 'intellectual' मोहब्बत में झाँकने को.

तलाशी : हर्फ़ दीवानी के

# # #
प्रिय !
लेकर देखो
अपनी तलाशी
मिलूंगी मैं
तुम्हारी रीझ में
तुम्हारी खीज में
तुम्हारी प्रतीक्षा में
तुम्हारी स्मृतियों में
तुम्हारे आंसुओं में
सिसकियों में
तन में
मन में
प्राणों में……..

मिलूंगी तुम्हे
मैं ही मैं
तुम्हारे चिंतन में
तुम्हारे सृजन में
नींद में
सपनों में
आशाओं में
उमंगों में………..

पाओगे तुम
मेरा ही प्रतिबिम्ब
तुम्हारी शाम में
तुम्हारी सुबह में
प्रार्थनाओं में
उपलाम्भों में
मनुहारों में
तुम्हारे शब्द शब्द में
साथ हूँ तुम्हारे
निमिष निमिष ……………

फिर भी
ना हो तुम्हे विश्वास
मेरे कथन पर
तो पूछ कर स्वयं से
बताओ !
कभी बीता है
एक लव भी ऐसा
रही नहीं जब
संग तुम्हारे मैं……..

है कोई अस्तित्व
तुम से अलग
मेरा
या
मुझ से अलग
तुम्हारा………

झूठ विनेश का

# # #
'ऑब्सेशन ' था उसका. शायद मिल्स एंड बून पढ़े हों, या ओ.पी.नय्यर/मदन मोहन/नौशाद साहब की धुनों से सजे एस. एच.बिहारी/शकील/नीरज आदि के गीतों को सुना हो, या ना जाने किस सोच में डूबी हो....यह बायोलोजी थी या साइकोलोजी...मगर थी बहुत ही दिल को छूनेवाली.

मेरे सोचों का सफ़र थमने का नाम नहीं ले रहा था......मैं ने दिल के दरवाज़े बंद किये और दिमाग को एक्टिवेट किया.....सफे पर जो अल्फाज़ उतारे वे यह थे :

मेरा झूठ..

# # #
सच है
प्रिये !
नहीं है अस्तित्व
तुम बिन मेरा
मुझ बिन तेरा,
बात यह जब
मस्तिष्क से उतर
जा ठहरेगी
ह्रदय में,
आयेगी
एक आवाज़ :
अस्तित्व
ना तेरा है
ना मेरा है
और ना ही
हमारा है,
हम हैं अंश
उस अस्तित्व के
जो अनादि है
अनन्त है,
होगा तब
आभास,
हे प्रिये !
अस्तित्व
हम ही हैं,
अस्तित्व
हम ही हैं !








वो सूनापन (दीवानी सीरिज)

यह ट्रैफिक 'वनवे' भी था. 'बोथ वेज' भीहो जाता था यदा कदा…..हाँ ऐसा भी बहुत बार हुआ था. अब यह वाकया ही ले लीजिये.

मेरे ममेरे भाई का इश्क एक गैर-हिन्दू लड़की से हो गया था. दोनों कि स्थिति दो देह और एक आत्मा जैसी थी. मैं भैया से जूनियर था, ननिहाल में ही पला बढा था, वह मेरे आदर्श थे, पढने में, लिखने में, खेलने में, आदतों और आदर्शों में. मेरे अधिकाँश मैनर्स /एक्स्प्रेशंस /मैनरिज्म उन जैसे ही हुआ करते थे. मगर उनके इस ‘अफेयर ’ के मुआमले में मेरी स्थिति एक खलनायक से कम नहीं थी, मैं भी सोचों से बहुत कंजर्वेटिव था खास कर इस इंटर-रेलिजिन रिलेशनशिप को लेकर.. ..या कहा जाय, परिवार के कुछ बड़ों ने मुझे चने के झाड पर चढ़ा कर मेरा अहम् पोषण कर दिया था जैसा कि किशोर-अवस्था में होता है…बहरहाल मैं 'इधर से उधर' किया करता था…..

भैय्या को MBA के लिए US भेज दिया गया….मगर उनके इश्क कि आग ठंडी नहीं हुई बल्कि प्रबल हो गई……कतिपय महत्वपूर्ण परिवारजनों की असहमति के बावजूद दोनों कि लव-कम-सेमी-अरेंज्ड मैरिज हो गई…..दोनों US जा बसे…

नियति को ना जाने क्या मंजूर था, दीवानी का परिवार भी उसी समुदाय से बिलोंग करता था , भाभी के खानदान से ही थी वोह भी. कालान्तर में विरोध के तीव्र स्वरों ने क्या किया, यह बाद की बात है और इसका अपना इतिहास है जिसका बोझ आज तक मेरे दिल-ओ- जेहन पर है.

मुझे NY University में कुछ शार्ट टर्म रिसर्च के लिए जाना था.भैय्या भाभी की insistence थी कि मैं उनके साथ रहूँ , ताकि पुरानी बातों को भुलाया जा सके और नयी बातों को नए नज़रिए से देखा जा सके. मैं उनके साथ रह रहा था…… वीकेंड पर हडसन दरिया के किनारे बैठ कई लम्बे डिसकशंस हम लोग करते थे-इश्क पर, रिलीजियस बिलीफ पर, individuality पर, लाइफ पर, हमारे feudal family background और उसके offshoots इत्यादि पर.

अपनी नोट बुक में कुछ कलम घिसाई करता रहता था……..भाभी ने मेरे लिखे एक सफे की कॉपी कर के दीवानी को भेज दिया था……..उस अस्फुट से लिखे को आपके साथ शेयर कर रहा हूँ :

विनेश की बात : तुम बिन....

# # #

सूना सूना सा
लगता है
तुम बिन...

हर लम्हे
खयालों में
समायी हो तुम,
ना जाने क्यों
होंश गवां बैठा हूँ मैं,
दिल में जेहन में
बस ज़िक्र है तेरा,
सोचों के हर घर में है
बस तेरा ही बसेरा,
हुआ नहीं था पहिले
ऐसा कभी,
सूना सूना सा
लगता है
तुम बिन...

भोर के उजास में
तुम हो,
सुबह की किरण के
प्रकाश में
तुम हो,
भाभी की नमाज़
पूजन अर्चन
और
भजनों की
धुन में
तुम हो,
भैय्या के स्नेह
और
सौहार्द में
तुम हो,
योग के
हर आसन में
तुम हो,
प्राणायाम के
हर श्वसन में
तुम हो,
नाश्ते से उठती
गरम खुशबू में
तुम हो,
घर की सुबह की
हर बात में
तुम हो,
ना जाने क्यों
होता है
महसूस मुझ को ऐसा
सूना सूना सा
लगता है
तुम बिन....

भैय्या की सुबह की
हर हरक़त
दफ्तर जाने से पहिले की
हर जुम्बिश
भाभी की हर नरमी
और
सरगर्मी में
तुम हो,
दफ्तर जाते वक़्त
भैय्या की बैचैनी,
भाभी की प्यारी
'बाय बाय' में
तुम हो
दफ्तर पहुँच के
भैय्या के पहिले फ़ोन
और
उसके इंतज़ार में
इधर उधर घूम रही
भाभी की
अकुलाहट में
तुम हो
ना जाने क्यूँ
इन दोनों की
हर बात में
तुम हो
तुम हो
तुम हो
सूना सूना सा
लगता है
तुम बिन.......

बात दीवानी की : जी करता है........

एक दिन देखता हूँ, मेरी स्टडी टेबल पर एक लिफाफा रखा हुआ है (भाभी ने रखा था) उसमें दीवानी कि यह तहरीर थी :

# # #
जी करता है
मेरा भी,
लिखे मुझे भी कोई
एक प्यारी स़ी पाती
जिसको पढ़कर
हो जाऊँ मैं
धरती-धरती
कोई दर्श्नातुर आये
मेरे दर पर
इधर उधर की बातों में
मुझको उलझा कर
इकटक ताके मुझे
चकोर-सा
पलक ओट से
जी करता है
मेरा भी…..

जी करता है
मेरा भी,
कोई सौ सौ बार
पूछने पर
नत हो कर
व्यर्थ कुरेदे
पैर अंगूठे से
धरती को
कांपते होंठ
धड़कते दिल से
चुप के कह दे
“कैसे कहूँ
प्रेम है मुझ को तुम से कितना ?”
और मैं
उसकी
इसी सादगी पर
मिट जाऊँ
जी करता है
मेरा भी...

जी करता है
मेरा भी,
लिखे मुझे भी कोई
इक प्यारी स़ी पाती
जिसको पढ़ कर
हो जाऊँ मैं
धरती-धरती....


स्वभाव संवाद और मुखौटे

मंज़र है
राम लीला का
कलाकारों की
छीना झपटी में
बदल गए थे मुखौटे
राम और रावन के..........

राम बोल रहे थे
मगर मुखौटा रावण का था
रावण बोल रहा था
किन्तु चेहरा राम का था
सुन कर
देख कर
पात्रों और संवादों का अंतर
दर्शकों को
लग रहा था
अटपटा,
कर रहे थे कानाफूसी
बदल गया कैसे
कुछ क्षणों में
ब्रह्म और
जीव का स्वभाव ?

Friday, May 1, 2009

तिरंगा

चेतन
अवचेतन
और अचेतन के
रंग लिए
मेरा मन
तिरंगा
अशोकचक्र की
गति लिए
चलायमान है...........

प्रतीक्षा है
होने की
इसे
केवल श्वेत
जो रंग है
चेतन्य का
जागरूकता का............

हो जाये समापन प्रयासों का
आ जाये सहजता
ऐसा हो
मेरे प्रभो !

भेद ...

अग्नि नहीं जानती
भेद
ईंधन और
चन्दन का.............

पवन नहीं पहचानती
अंतर
सुगंध और
दुर्गन्ध का..............

आकाश नहीं मानता
फर्क
अँधेरे और
सवेरे का..................

भेद नहीं करती
प्रकृति
यह तो है बस
मानव की ही कृति..............

थोथा बडापन

आते देख
नन्ही चींटी को
बोला पर्वत
नादाँ !
तेरे नन्हे
दुर्बल पांव
कैसे कर पाएंगे
मेरी विकट चढ़ाई……….

हे तुच्छ प्राणी !
क्यों नहीं
बदल लेती
राह अपनी ;
इस जटिल मार्ग
की बाधाएं
कर देगी
नष्ट तुम को……………..

चींटी ने कहा:
हे पर्वत !
डरा मत मुझ को
तू बस एक ढेर
है ढेलों का
कर रहा है क्यूँ
वृथा गर्व
स्वयं पर……………..

उड़ते पक्षी ने
सर पर तुम्हारे
कर दी है विष्टा
और लग गया है
तेरी शान में बट्टा;
बता मूढ़ !
कहाँ चली गई
हेंकड़ी तुम्हारी…………

पर्वत हुआ था
आग बबूला
कर बोला चीत्कार
मैं नहीं कोई
ढीला ढाला
बालू का टीला;
बज्र स़ी है
देह मेरी……………..

तुरत लौट चल
अपने बिल को
छोड़ कर ढिठाई ;
चिपका अपना गुरूर
आना मत कभी भी
सम्मुख मेरे……………

चींटी ने दी
ललकार पर्वत को
मत बजा अपने
थोथे गालों को
क्या है तुम्हारी बिसात ?
हे जड़मति !
लगता मुझको
राई जैसा
हिमालय पिता तुम्हारा……..

मैं हूँ चेतन्य
तुम हो जड़
क्या हो संवाद कुछ
तुम से
मेरे अढाई अक्षरों में
बसता रहस्य सृष्टि का
खोज रे पत्थर
है कहाँ
जीव और
आत्मा तुम्हारी………….

दायरे .......

# # #

पढ़ पढ़ कर
शास्त्रों को,
सुन सुन कर
माशरे को,
बना डाले हैं
मैंने
अजीब से
खतरनाक
दायरे,
जो ना जीने देते हैं
ना मरने
ना बैठने देते हैं
ना कुछ करने.....

आज सुनूंगा सदा
सिर्फ
दिल की,
तोड़ कर
अपने बनाये
इन दायरों को,
हो कर
आज़ाद
इन बंधनों से,
जीऊंगा
अपनी तरहा,
मरूँगा
सब की तरहा.....