Thursday, February 12, 2009

बीते पल ...(दीवानी सीरीज)

उस दिन कुछ ज्यादा ही संजीदा हो गई थी वो. उसे हमेशा आपने 'पास्ट' का 'टेंशन' रहता था, ना जाने क्यों. 'पास्ट' तो शायद बहाना था, उसकी सोचों में 'निगेटिविटी ' जा जाने क्यूँ समाती जा रही थी. उसने कहा था:

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हर क्षण
जीवन का
काश ! एक शब्द होता
लिखा हुआ
स्लेट पर--
जिसे
देख कर
छू कर
पढ़ कर
जा सकता है
मिटाया....

क्यों
रहतें है
चिपके
बीते पल
वर्तमान से.....?

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बात को कैसे लिया जाय, हमारे सोच का प्रवाह बहुत कुछ उस पर 'डिपेंड' करतें हैं. झील किनारे बेंच पर बैठे मैने कुछ ऐसा दिलासा दिया था :

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यह लम्हे
जिन्दगी के
रंग है
इन्द्रधनुष के
फैले हुए हैं जो
निकल कर
क्षितिज से,
नहीं मिटा पाते
जिन्हें हम
चाह कर भी....

क्यूँ
चाहती हो
मिटाना
बीते पलों के
रंगों को ?
खिलतें है
जब जब
ये रंग
दिख जाती है
इन्द्रधनुष
सतरंगी
वर्तमान में भी ....

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