Wednesday, February 11, 2009

क्या जवाब दोगे

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क्यों भर रहे हो जहर
इन्सानियत के दुश्मनों
उन बच्चों के ज़ेहन में
जो नहीं जानते मज़हब
किस चिड़िया का नाम है ?

बदल गई है दुनिया
जमाना भी ले चुका है
अनगिन करवटें-फिर भी
क्यों धकेल रहे हो
उन्हें उस तारीख की जुल्मत में
जो कभी नहीं रहा है उनका.

हम सब औलाद हैं
उस जमीन-ए-जन्नत के
जिसका ताज हिमाला है
पवित्र नदियाँ इस छोर से
उस छोर को बहती है
सागर जिसके चरणों को धोता है
जहाँ तुलसी कबीर बुल्लेशाह
एक से साज़ और आवाज़ में गाये जाते हैं
जहाँ के बाशिंदे एक से तरानों पर
झूमते हैं…..मौज मनाते हैं.

क्या हुआ लकीर खींच ,कुछ
सियासतदानों ने बाँट दिया हमको
मगर वह तो गए कल की बात है
हम ने सांस ली है इस युग में
जहाँ उनका जिक्र पाया जाता है
खोजने पर……………………
महज़ स्कूल की किताबों में


हमारी भाषा एक है
हमारा संगीत एक से है
एहसास भी एक जैसे है
मोहब्बतें भी एक स़ी है
रंग और लिबास भी एक से हैं
क्यों बाँट रहे हो हमें
उन बातों के लिए जो बेमानी है.

जो मरा और जिसने मारा,
दोनों की माँओं के
फ़िक्र का आलम एक जैसा था
दोनों के जज़्बों का आलम एक सा था
जूनून-ए-पाकीज़गी एक स़ी थी
फर्क महज़ इतना था
उन बच्चों की सचाई को तुमने
झूठ की बिना पर छला था
और इन नौजवानों ने फ़र्ज़ के नाते
खुद को इन्सानियत पर कुर्बान किया था.

क्या गुनाह था उन बेकसूरों का
जो बैमौत मारे गए तुम्हारी
तंग-दिली तंग-जेहनी की लड़ाई में ?
क्यों छीना माँओं से बेटों को
बीवियों से खाविन्दों को
औलादों से माँ-बाप को……. ?
किस खुदा ने चाहा के उसके नाम
हो इंसानी खूँ का जलील तमाशा ?
जब होगे मुखातिब परवरदिगार के
क्या जवाब दोगे अपने खूँ-आलूदा लबों से.....
उस सब के पालनहार को
जिसके नाम पर कर रहे हो तुम सियासत ?

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