Wednesday, February 11, 2009

छोटी छोटी खुशियाँ



नए साल की पहली सुबह
बटोरी थी मैने
चन्द नन्ही नन्ही खुशियाँ
उन छोटी छोटी खुशियों में
डुबा कर तन मन अपना
खुश हो गया था मैं.

सुबह की सर्द हवा ने
जब बदन को झिंझोड़ा
लपेट कर खुद को
नए कम्बल में
खुश हो गया था मैं.

चाय की गरम भाप ने
छुआ था जब चेहरे को
होठों से छुआ कर
गिलास के गरम बदन को
खुश हो गया था मैं.

पड़ोसी के नन्हे बच्चे
की कोमल हथेलियों को
महसूस कर
सुन कर उसकी मासूम किलकारियों को
देख उस की भोली मुस्कान को
खुश हो गया था मैं.

गुनगुनाये जा रहा था मैं
"हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता
चला गया......"
हलवाई की दुकान पर
गरम समोसों और जलेबियों के
बीच जब रेडियो पर यही नगमा बजा
खुश हो गया था मैं.

सूरज की किरणों ने अपना जलवा बिखेरा
परिंदों ने खुले मैदान में
दाने चुगना शुरू किया
बचों को खिलखिलाते हुए
स्कूली पोषक में जाते देखा
हर शै को जागते,खिलते, मुस्कुराते देखा
सुनहरी धूप का आलिंगन पा
खुश हो गया था मैं.

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