Tuesday, September 21, 2010

शीर्षक ....

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जीवन रण
जूझते जूझते
शीश कटा
बैठी हूँ मैं,
मोह सागर
गहराई में
अनायास
पैठी हूँ मैं
रहा नहीं अब
पोषक मेरा
क्यों चाहते हो
शीर्षक मेरा...

जानो तो मोहे
पूरा जानो
जैसी हूँ
वैसी को मानो
कुछ ना रहा
आकर्षक मेरा
क्यों चाहते हो
शीर्षक मेरा....

खेत हूँ मैं बस
बंजर जैसी
बिन बरखा
सूखा हो जैसी
रूठ गया है
कृषक मेरा
क्यों चाहते हो
शीर्षक मेरा...

टूटे घुँघरू
नाच रही हूँ
हर दृष्टि को
जांच रही हूँ
भ्रमित कुंठित
हर दर्शक मेरा
क्यों चाहते हो
शीर्षक मेरा...

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